परम्परा
(व्यंग्य )
(व्यंग्य )
कहते हैं भारत परम्पराओ का देश है यहाँ अनूठी अनूठी परम्पराए हैं .... जैसे नमस्कार करने की परम्परा. हाथ जोड़कर राम राम कहने की परम्परा. पैर चुने की परम्परा ...एक परम्परा मैंने देखी .गॉवो में किसी नयी बहु के आने पर पास पड़ोस से आई बुजुर्ग औरतों के पैर दबाने की परम्परा.. यही कोई औरतों का झुण्ड बैठा है और एक नयी औरत उस झुण्ड में सम्मलित हो जाये तो सास बहु को आवाज लगाएगी.. बहु देख तो कौन आया है तेरी चाची आई है.तेरी ताई आई है या फिर दादी आई है... बहु की फिर से लाइन में लगकर सबके पैर दबने होंगे..मजाल कोई एक भी औरत छूट जाये.. वो औरते तो आशीर्वचन बोल कर चली जाएँगी..फिर सास की गर्जना शुरू होगी वो अलग से..क्या पोले पोले हाथों से पैर दबाती है फला की बहु को देखो..कैसे शकुन से पैर दबाती है..
बहु पैर दबाती है तो देश की परम्परा जागती है.सास भी प्रसन्न है पड़ोसिने भी प्रसन्न हैं..देश भी प्रसन्न है..क्योंकि सवाल परम्परा का है..जब से देश बना तब से परम्परा है..परम्परा है तो उसका निर्वाह है..इस परम्परा को चलने के लिए किसी आकाशवाणी की भी जरूरत नहीं है.. ये तो यूँ ही पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है..
अब कैसे चली आ रही हैं ये समझे आप.. सबके सब व्यस्त होते हुए भी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं ये क्या कम बात है..
सुबह काकी से मुलाकात हुई तो ऐसे ही पूछ लिया-"काकी ये पैर दबाने जैसी परम्परा क्या बकवास सी नहीं लगती..."
"शस्सस्सस्स , दादी सुनेगी तो मुस्किल हो जाएगी...चुप रहो..."
देखो जी देश परम्परा बनाये रखना चाहता है तो भी परेशानी..वो मिस्टर शर्मा है न ,,मिल गए पार्क में हम उनसे पूछ बैठे - शर्मा जी देश में परम्पराए क्यों हैं?
शर्मा जी बिफर पड़े...अरे कमाल है आपको परम्परा से भी ऐतराज़ है.. देश को देखो..देश की प्रजा को देखो..वजीर को देखो..कपाल भाती की मुद्रा धारण की और बोले --अब देखो भारत में योग की परम्परा है ,,प्रधानमन्त्री जी ने तो देश को योग करने, सिखाने के लिए योग दिवस सबके लिए २१ जून को अनिवार्य कर दिया..
हमने चुटकी काटी बोले--"शर्माजी क्या ये जरुरी है कि सब योग करें ,,न करना चाहे तो?"
"अब ये लो भाई वो प्रधानमंत्री हैं , अब उन्हें देश की चिंता है लोगो की चिंता है. लोगो के स्वास्थ्य की चिंता है और आपको उसमे भी परेशानी है..गलती आपकी नहीं लोगो का स्वाभाव ही ऐसा है कि आलोचना अधिक और काम कम.."-शर्माजी का चेहरा लाल था.
हमने पुच्छा--"अच्छा शर्माजी , ये योग में सूर्य नमस्कार जैसा भी कुछ करते ही हैं न ?"
"हाँ जी करते हैं"
"तो फिर ये सूर्य राम राम क्यों नहीं होता? हम तो कभी नमस्कार तो कभी राम-राम करते ही हैं न .."
शर्मा जी चुपचाप अपने योग मे विलीन हो गए, तल्लीन हो गए..हम बिना जबाब सुने ही चल पड़े..
घर पहुंचे ..सोचा नहा धोकर ऑफिस के लिए निकलते है..
पिताजी का कर्कस स्वर कानो में पड़ा---बेटा सुदीप , देखो ताउजी आये हैं चलो पैर छूकर आशीर्वाद लो..
समझ आ गया कि भारत वाकई परम्पराओं का देश है..
बहु पैर दबाती है तो देश की परम्परा जागती है.सास भी प्रसन्न है पड़ोसिने भी प्रसन्न हैं..देश भी प्रसन्न है..क्योंकि सवाल परम्परा का है..जब से देश बना तब से परम्परा है..परम्परा है तो उसका निर्वाह है..इस परम्परा को चलने के लिए किसी आकाशवाणी की भी जरूरत नहीं है.. ये तो यूँ ही पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है..
अब कैसे चली आ रही हैं ये समझे आप.. सबके सब व्यस्त होते हुए भी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं ये क्या कम बात है..
सुबह काकी से मुलाकात हुई तो ऐसे ही पूछ लिया-"काकी ये पैर दबाने जैसी परम्परा क्या बकवास सी नहीं लगती..."
"शस्सस्सस्स , दादी सुनेगी तो मुस्किल हो जाएगी...चुप रहो..."
देखो जी देश परम्परा बनाये रखना चाहता है तो भी परेशानी..वो मिस्टर शर्मा है न ,,मिल गए पार्क में हम उनसे पूछ बैठे - शर्मा जी देश में परम्पराए क्यों हैं?
शर्मा जी बिफर पड़े...अरे कमाल है आपको परम्परा से भी ऐतराज़ है.. देश को देखो..देश की प्रजा को देखो..वजीर को देखो..कपाल भाती की मुद्रा धारण की और बोले --अब देखो भारत में योग की परम्परा है ,,प्रधानमन्त्री जी ने तो देश को योग करने, सिखाने के लिए योग दिवस सबके लिए २१ जून को अनिवार्य कर दिया..
हमने चुटकी काटी बोले--"शर्माजी क्या ये जरुरी है कि सब योग करें ,,न करना चाहे तो?"
"अब ये लो भाई वो प्रधानमंत्री हैं , अब उन्हें देश की चिंता है लोगो की चिंता है. लोगो के स्वास्थ्य की चिंता है और आपको उसमे भी परेशानी है..गलती आपकी नहीं लोगो का स्वाभाव ही ऐसा है कि आलोचना अधिक और काम कम.."-शर्माजी का चेहरा लाल था.
हमने पुच्छा--"अच्छा शर्माजी , ये योग में सूर्य नमस्कार जैसा भी कुछ करते ही हैं न ?"
"हाँ जी करते हैं"
"तो फिर ये सूर्य राम राम क्यों नहीं होता? हम तो कभी नमस्कार तो कभी राम-राम करते ही हैं न .."
शर्मा जी चुपचाप अपने योग मे विलीन हो गए, तल्लीन हो गए..हम बिना जबाब सुने ही चल पड़े..
घर पहुंचे ..सोचा नहा धोकर ऑफिस के लिए निकलते है..
पिताजी का कर्कस स्वर कानो में पड़ा---बेटा सुदीप , देखो ताउजी आये हैं चलो पैर छूकर आशीर्वाद लो..
समझ आ गया कि भारत वाकई परम्पराओं का देश है..
संदीप तोमर
