Wednesday, June 10, 2015

परम्परा
(व्यंग्य )
कहते हैं भारत परम्पराओ का देश है यहाँ अनूठी अनूठी परम्पराए हैं .... जैसे नमस्कार करने की परम्परा. हाथ जोड़कर राम राम कहने की परम्परा. पैर चुने की परम्परा ...एक परम्परा मैंने देखी .गॉवो में किसी नयी बहु के आने पर पास पड़ोस से आई बुजुर्ग औरतों के पैर दबाने की परम्परा.. यही कोई औरतों का झुण्ड बैठा है और एक नयी औरत उस झुण्ड में सम्मलित हो जाये तो सास बहु को आवाज लगाएगी.. बहु देख तो कौन आया है तेरी चाची आई है.तेरी ताई आई है या फिर दादी आई है... बहु की फिर से लाइन में लगकर सबके पैर दबने होंगे..मजाल कोई एक भी औरत छूट जाये.. वो औरते तो आशीर्वचन बोल कर चली जाएँगी..फिर सास की गर्जना शुरू होगी वो अलग से..क्या पोले पोले हाथों से पैर दबाती है फला की बहु को देखो..कैसे शकुन से पैर दबाती है..
बहु पैर दबाती है तो देश की परम्परा जागती है.सास भी प्रसन्न है पड़ोसिने भी प्रसन्न हैं..देश भी प्रसन्न है..क्योंकि सवाल परम्परा का है..जब से देश बना तब से परम्परा है..परम्परा है तो उसका निर्वाह है..इस परम्परा को चलने के लिए किसी आकाशवाणी की भी जरूरत नहीं है.. ये तो यूँ ही पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है..
अब कैसे चली आ रही हैं ये समझे आप.. सबके सब व्यस्त होते हुए भी परम्परा का निर्वाह कर रहे हैं ये क्या कम बात है..
सुबह काकी से मुलाकात हुई तो ऐसे ही पूछ लिया-"काकी ये पैर दबाने जैसी परम्परा क्या बकवास सी नहीं लगती..."
"शस्सस्सस्स , दादी सुनेगी तो मुस्किल हो जाएगी...चुप रहो..."
देखो जी देश परम्परा बनाये रखना चाहता है तो भी परेशानी..वो मिस्टर शर्मा है न ,,मिल गए पार्क में हम उनसे पूछ बैठे - शर्मा जी देश में परम्पराए क्यों हैं?
शर्मा जी बिफर पड़े...अरे कमाल है आपको परम्परा से भी ऐतराज़ है.. देश को देखो..देश की प्रजा को देखो..वजीर को देखो..कपाल भाती की मुद्रा धारण की और बोले --अब देखो भारत में योग की परम्परा है ,,प्रधानमन्त्री जी ने तो देश को योग करने, सिखाने के लिए योग दिवस सबके लिए २१ जून को अनिवार्य कर दिया..
हमने चुटकी काटी बोले--"शर्माजी क्या ये जरुरी है कि सब योग करें ,,न करना चाहे तो?"
"अब ये लो भाई वो प्रधानमंत्री हैं , अब उन्हें देश की चिंता है लोगो की चिंता है. लोगो के स्वास्थ्य की चिंता है और आपको उसमे भी परेशानी है..गलती आपकी नहीं लोगो का स्वाभाव ही ऐसा है कि आलोचना अधिक और काम कम.."-शर्माजी का चेहरा लाल था.
हमने पुच्छा--"अच्छा शर्माजी , ये योग में सूर्य नमस्कार जैसा भी कुछ करते ही हैं न ?"
"हाँ जी करते हैं"
"तो फिर ये सूर्य राम राम क्यों नहीं होता? हम तो कभी नमस्कार तो कभी राम-राम करते ही हैं न .."
शर्मा जी चुपचाप अपने योग मे विलीन हो गए, तल्लीन हो गए..हम बिना जबाब सुने ही चल पड़े..
घर पहुंचे ..सोचा नहा धोकर ऑफिस के लिए निकलते है..
पिताजी का कर्कस स्वर कानो में पड़ा---बेटा सुदीप , देखो ताउजी आये हैं चलो पैर छूकर आशीर्वाद लो..
समझ आ गया कि भारत वाकई परम्पराओं का देश है..

संदीप तोमर 

Tuesday, June 2, 2015

भक्त  उवाच 
देश देख रहा है और आप भी देख ही रहे हैं..प्रभु अपनी लीला रच रहे है..भक्त गण हताश हैं निराश है..अब निराशा का किसी से क्या लेना देन  कोई भी कभी भी किसी से भी निराश हो सकता है..भक्त प्रभु से निराश है जनता राजा से निराश है. राजा प्रजा से निराश है साथ ही निराश है पुराने राजा से..
अब उस दिन हम स्वर्ग को देखने के लिए निकले ही थे ..देखने कि स्वर्ग के हालात कैसे हैं ..निकले ही थे कि एक भक्त प्रकट हो गए..भक्त एकदम कट्टर वाले..बोले-  "क्या सुदीप बाबु ? कहाँ घुमने निकले हो ?"
हमने कहा -"हाँ !घूम ही रहे हैं..देखना था कि सेवक जी ने स्वर्ग को कितना चमकाया है ?"
भक्त ने कहा-"अरे पत्रकार महोदय न पूछे,, अभी गद्दी  संभाले दिन ही कितने हुए हैं ?"
"लेकिन सुना तो ये जा रहा है कि सेवक जी आम जनता मेरा मतलब है कि भक्तो का ख्याल नहीं रख पा रहे?"
भक्त ने कहा----कुबेर का खजाना पहले सेवक ने ख़त्म किया हुआ था..अब खजाना खाली तो सेवक क्या करे..खजाना ऋणात्मक था.. फिर सेवक ने एक साल में खजाना भरा.
हमने पूछा--"कही डैकेती डाले क्या"..
.बोले -"नहीं--- वो तो पुष्पक विमान के इंधन से आया."
. हमने पूछा -"वो कैसे?"  तो भक्त ने बताया-- "भैया सेवक ने इंधन का दाम कम नहीं किया. जनता देती रही खजाना भरता रहा".... 
हमने कहा -"भक्त भाई आपने हमारे चक्षु खोल दिए..और दो चार चीजो का दाम बढ़ा दीजिये ताकि".. 
फिर हम ठहरे जड़बुद्धि फिर एक सवाल पूछ बैठे-- "ये तो बताइए कि समस्त लोग की यात्रा का व्यय प्रभु कहाँ से लाते है...?"
तो भक्त की  नजरे हमें भस्म करने की मुद्रा में थी, बोले-- "ये जो कोष भरा है उसी से खर्च होता है"..
 हमने पूछा-" और आज कल नारद मुनि नहीं दीखते.?". बोले -"अब परभू ही सारे विभाग देखते हैं.. पहले सब लोगो में भ्रस्रटाचार  था.. अब सब ठीक है."
..हमें फिर सवाल किया..-"और उर्वशी कहाँ है? सुना है कि बड़ी कटीली नचनियां थी.. स्वर्ग में उसे बड़े अदब से देखा जाता था"..
भक्त हौले से मुस्काए..बोले---" हाँ , आज कल प्रभु ने अपने सभासदो में प्रमुख स्थान दिया है...सम्पूर्ण लोको में अब ज्ञान का विस्तार होगा.. आपके भी."
वो  मुस्कुरा रहे थे लेकिन एक झल्लाहट  उनके  चेहरे पर साफ नजर आ रही थी...
हमने ने सवाल करना था ..पत्रकार धर्म का पालन करना था.फिर से सवाल दागा-"अरे बंधू हमने तो सुना है कि सेवक जी  रॉक स्टार हो गए है "
"पत्रकार जी देखिये कहे देते हैं हमारे सेवक जी के लिए ऐसे शब्द इस्तेमाल न करें,, वो तो ब्राण्ड है  ब्राण्ड.."-अब उनका  परा सातवें  आसमान पर था..
"ओके जी ब्रांड ही मान लेते हैं.. हमें क्या फर्क पड़ता है."
"लेकिन हमें कर्क पड़ता है जी ,,आप जैसे पत्रकार हमारे सेवक जी को बदनाम करते हैं..सेवक जी के आने से स्वर्ग का हर नागरिक आत्मनिर्भर हुआ है "
हम उनके तर्क से थोडा सकपकाए फिर पतली गली ढूंढने लगे निकलने के लिए..पतली गली से निकले तो देखा कि सब्जी बाजार भरा था..
सब्जी विक्रेता की आवाजे  कानो में पद रही थी--टमाटर  चालीस रूपये किलो... भिन्डी ६० रूपये किलो...लोकी ३० रूपये किलो..
हमें अच्छे से समझ आ गया कि वास्तव में सवार का हर नागरिक आत्मनिर्भर है.. 

Saturday, June 25, 2011

Thursday, October 18, 2007