Monday, December 21, 2015

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री
आपने  शिक्षा में गुणात्मक बदलाव के लिए सभी से सुझाव मांगे थे इसी कडी में मंत्री महोदया दिल्ली के छात्रों से भी मुखाबित हुई थी ..ये एक सराहने कदम था और उनके इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए ......भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शिक्षा में बदलाव के लिए सोचना और आम जनता से सुझाव माँगा एक साहसिक कदम तो है ही. ......मंत्री महोदया को बच्चो ने कुछ सुझाव दिए थे  मसलन सीबीएसई पुनः दसवीं कि बोर्ड की परीक्षा की बहाली करे ..... दूसरा १२वीं के एग्जाम और कोम्पीटेटीव एग्जाम का सिलेबस एक ही हो ......मतलब अब छात्र आकाश  इंस्टिट्यूट और एल एन इंस्टिट्यूट कोटा में अपने माता पिता की गाढ़ी कमाई को सुवाह करने के इच्छुक नहीं हैं ........मंत्री महोदया आप जानती होंगी कि पुरे भारतवर्ष में ये कुकुरमुत्ते और बड़े वाट वृक्ष स्कूल शिक्षा की चूल हिला रहे हैं .....पूर्व के मंत्रियों ने पहले ही शिक्षा के निजीकरण को अघोषित रूप से लागु किया हुआ है ....सरकारी शिक्षा तंत्र को विभिन्न तरीके अपनाकर छिन्न- भिन्न किया हुआ है ........ये इंस्टिट्यूट कोम्पीटेटीव एग्जाम में सफल होने वाले छात्रों की संख्या के कई हज़ार गुना छात्रों को इंजिनियर , डॉक्टर , इत्यादि बनने का सपना दिखाते है ...जबकि सच्चाई ये है कि इनमे पढने वाले बच्चो का एक प्रतिशत ही सफल हो पाते है .... बच्चो का भविष्य तो ये नहीं बना पाते अलबत्ता अपनी संतान का ऐसा भविष्य बना जाते है कि अगली सात पीढ़ियों तक को कुछ बनने की जरुरत ही नहीं होती...और अब तो इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों का आत्महत्या की और अग्रसर होना माता पिता के लिए गहन चिंता का विषय बना हुआ है।
मंत्री महोदया इस और वास्तव में ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ......ताकि सरकारी जमात के मास्टर के मुंह  से निकम्मे होने का कलंक  भी धुल सके ...सनद रहे कि सरकारी अध्यापक वही करता है जो सरकार की मनसा होती है .....बच्चो ने cce पैटर्न की भी आलोचना की है एक जागरूक शिक्षक होने के नाते मैं भी इस पैटर्न की आलोचना करता हूँ .....बिना पढ़े या बिना स्कूल आये पास होने की परम्परा देश के भविष्य को पूर्ण अन्धकार में धकेल देगी ऐसा मेरा अनुमान है .......
मंत्री महोदया आपने शिक्षा पर सुझाव मांगे थे तो कुछ बाते हैं जो आपसे साझा करना चाहता हूँ--------
अनिल सदगोपाल की पुस्तक "शिक्षा में बदलाव का सवाल" एक बार अवश्य पढ़ें ......मुझे लगता है कि अगर कोई अध्यापक या शिक्षाविद इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया तो निसंदेह वह शिक्षा विमर्श से अभी तक अछुता है.....
नई शिक्षा नीति १९८६ एक वृहद नीति है उसको पूर्ण रूप से कैसे लागू किया जाये इस पर विचार करने की आवश्यकता है ...ऐसा मुझे लगता है .....
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा प्रणाली हमारी व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है ...ये व्यवस्था रटकर उगलने की नीति पर ज्यादा बल देती है जिसे पाउलो फ्रेरे बैंकीय अवधारणा कहते है ......इससे शिक्षा को निजात दिलाने की अवश्यक्ताव है इसके लिए आप सपुस्तक प्रणाली की शुरुवात करे जिसमे प्रश्नपत्र का पैटर्न बदलना होगा ...ताकि बच्चे को पता रहे कि किस पुस्तक में कौन सा टॉपिक किस तरह से बताया गया है और वो इससे विश्लेषण सीख सकेंगे उनकी तर्क क्षमता का विकास होगा और वो जागरूक भी हो सकेंगे ......
अगर आप और हमारे शिक्षाविद मानते है कि देश के नौनिहाल देश का भविष्य हैं तो मुझे लगता है कि "शिक्षा का अधिकार" कानून की समीक्षा की जाये...
स्कूल में बुनियादी सुविधा दिए बगैर शिक्षा में सुधार की बात सोचना सूरज को दीपक दिखने जैसा होगा .... छात्र -अध्यापक अनुपात सही किये बैगर आप शिक्षा में बदलाव लाना तो दूर इसमें रत्तीभर भी  परिणाम की उम्मीद नहीं कर सकते .....
अत्यंत उर्जावान अध्यापक रोज़ अपनी उर्जा को १००-११० छात्रो की कक्षा में मात्र अनुशासन बनाने के नाम पर जाया करता है ...उसकी उर्जा के सदुपयोग के बारे में आप विचार करें .......
आपका एक अध्यापक
संदीप तोमर
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स्पर्श "
उसका घुटना काफी हद तक छिल गया था..खून रिस रहा था.. इधर उधर भी काफी खरोंच आ गयी थी...वो दर्द से कराह रहा था..लोगो से हमदर्दी की उम्मीद में इधर उधर देख रहा था..लोग बाग़ बिना देखे पास से निकल रहे थे..उसे सहानुभूति की कोई किरण दिकह्यी नहीं दी..
वो चौंक गया जा दो कोमल हाथ उसके घायल घुटने को सहलाने लगे.. अपने दुपट्टे के पल्लू से उसके घाव को पोंछा.. जब खून का रिसना बंद नहीं हुआ तो दुपट्टे का एक पल्लू फाड़कर उसके घुटने पर बांध दिया.. और उसे कंधे का सहारा देकर उठाया और कस कर सीने से लगा लिया...हाथों का सहारा देकर वो उसे लेकर घर की और बढ़ गयी..
एक स्पर्श दर्द को भी छूमंतर कर गया..

२. "सोच "
वो बेचारा अलसुबह से कोठी के गटर को बांस की खरपच्ची से साफ़ करने की कोशिश करता रहा.. जब सफलता हाथ न लगी तो उसने कोठी की मालकिन से कहा -"मेम साहबमेन होल में घुसना पड़ेगा.. यहाँ से तो बात नहीं बन रही.."
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ठीक है भैयाकैसे भी करके इसे साफ़ कर दो.. शाम से गटर बंद पड़ा है. टॉयलेट सीट से पानी और गंद नहीं निकल पा रहा.. आज सुबह से कोई फ्रेस भी नहीं हो पाया.."
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जी मेम साहब" -कहकर उसने अपने कपडे खोले और गटर में उतर गया.. तकरीबन डेढ़ -दो घंटे की मसक्कत के बाद उसे सफलता हाथ लगी.. वो फावड़े से मेन होल का गंद बाहर निकलता रहा.. जब वो साफ़ सफाई बाहर निकला तो उसने देखाउसकी कमीज पर भी गंद पड गया था..
उसने कोठी की मालकिन को कहा -"मेम साहबमेरी कमीज ख़राब हो गयी है अगर बाबूजी की कोई पुराणी कमीज मिल जाती तो मैं आराम से घर तक पहुँच जाता .. आप मेरे मेहनताने में से पैसे काट सकती हो.."
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देखती हूँ भैया " -कहकर वो अन्दर गयी और थोड़ी एर बाद एक टी-शर्ट लेकर बहार आई...
और उसे दे दी..
टी-शर्ट पहन और अपनी मजदूरी ले वो गहर की और जाने लगा...टी शर्ट पर लिखा था---if being sexy is a crime ,arrest me..
रास्ते में जो भी उसे देखता हँसने लगता. उसे समझ नहीं आया कि लोग क्यों हँस रहे हैं .. वो रास्ता तय करके घर तक पहुँच ही गया..
३.
वेडनेसडे 
सिर भारी भारी लग रहा था... पढने की कोशिश की लेकिन नहीं पढ़ पाया... लाइट ऑफ करके लेट गया.. रूम का दरवाजा खुला था...मायो ने दरवाजा खटखटाया.. मैंने उसे अन्दर आने को बोला...अन्दर आकर मायो ने पूछा-"सुदीप ट्यूब लाइट ऑफ क्यों है ?क्या हुआ?"
"
कुछ नहीं,,सिर में दर्द है "-मैंने जबाब दिया..
ओह सिर में दर्द है ....सुदीप तुम बैठो मैं अभी ठीक करता हूँ...यीशु सब ठीक करेगा..."
मैं बैठ गया.... मायो ने मेरे हाथ अपने हाथ में लिए और बैठ गया. उसके होंठ बुदबुदा रहे थे... उसने कहा-" कैसा महसूस कर रहे हो ?"
"
ठंडक है... "
"
मैं जीसस से परार्थना किया.. वो सब ठीक करेगा...."--मायो न कहा... फिर उसने ट्यूब लाइट जला दी...
मायो बोला- विजय नगर में चर्च चला करो... प्रार्थना करेगा तो जीसस सब ठीक करेगा... वेडनेसडे को शाम में प्रेयर होता है तुम साथ चलेगा तो जीसस खुश होगा...तुम्हार दोस्त योगेश भी जाता था ..पहले वो दुखी रहता था अब सब ठीक है..उसने बप्तिसा भी ले लिया है "
मुझे बप्तिसा का अर्थ तब समझ नहीं आया..
वेडनेसडे को मायो फिर मेरे रूम में आया.. हम दोनों तैयार होकर चर्च गए.. चर्च में लोग अपना अनुभव सुनाते और कहते कि मैं दुखी था जीसस ने मेरी प्रेयर को सुना.. अब मैं अच्छा महसूस कर रहा हूँ.. ब्रोदर जॉय ने मुझसे कहा- सुदीप तुम भी अपना अनुभव शेयर करों ..मैं उनसे कहता अभी मैं सीख रहा हूँ.. मायो और मैं हर वेडनेसडे चर्च जाने लगे.. ब्रोदर जॉय ने मुझे बाइबल दी... मैंने बाइबल पढना शुरू किया.. मुझे जो अजीब या अच्छा लगता ...मैं उसे अंडर लाइन कर देता... एक दिन फिर चर्च में प्रेयर चल रही थी.. मेरे चेहरे पर अजीब से भाव थे.. ब्रोदर जॉय ने कहा --सुदीप कुछ कहना चाहते हो.. जीसस तुम्हारे साथ है बोलो क्या परेशानी है...मैं खड़ा हुआ और बोला -- ".बाइबल में पेज नंबर इतने पर लिखा है कि महिलाओं का परसिया (चर्च) में जाना मना है.. ऐसा क्यों ?"
ब्रोदर जॉय के चेहरे पर हवाइयां थी.. फिर वो थोडा संभले और बोले-- "चाय के समय बात करेंगे..."
प्रेयर ख़त्म हुई . तो बाहर आकर लोग चाय पीने लगे.. मायो ने मेरे हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया ...ब्रोदर जॉय मेरे पास आये और बोले- सुदीप बिस्किट लो"
मैंने फिर उत्सुकतावश पूछा - वो... महिलाएं...."
वो बोले-"सुदीप तुम्हे ऐसे सवाल सबके सामने नहीं पूछने चाहिए.. तुमने देखा ना मेरे चर्च में महिलाएं हैं ना."
"
फिर ये सब बाइबल में क्यों लिखा...क्या इसमें गलत लिखा?"
"
नहीं गलत नहीं लिखा... तुम जानते हो ना महिलाएं कितनी बातूनी होती है... चर्च में आएँगी तो फिर प्रेयर में परेशानी होगी..."
फिर आपने इन्हें अनुमति देकर बाइबल का उलट व्यवहार क्यों किया है?"
ब्रोदर जॉय निरुत्तर थे...
अगले वेडनेसडे मायो का मैं इंतज़ार करता रहा.. शायद मेरा डोर वो खटखाटायेगा ...वो वेडनेसडे होस्टल में रहते नहीं आया...

४.
ऐलान
उसने बड़े जोश के साथ ये ऐलान किया था कि मैं बिना दहेज़ लिए शादी करके एक मिशाल कायम करूँगा..... पिता ने काफी समझाया कि बेटा मेरा समाज में मान सम्मान है..... हम खानदानी ठाकुर हैं...... तुम्हारे दादा जी की थाकुरियत ५० गांवों में चलती थी.... अब वो नहीं रहे तो ये जिम्मा मेरे ऊपर आ गया.... हमारे यहाँ दिन भर भण्डारा चलता रहता है....... बिना दहेज़ की शादी होगी तो सारे ठाकुर समाज में हमारी थू थू होगी....लोग हमारे बारे में बाते बनायेंगे....... सुदीप ने पिता की बाते सुनी तो भी उसका निर्णय नहीं बदला...... 
सुदीप के साथ काम करने वाली सजातीय कमला ने उसे नेहा से मिलवाया ...... नेहा के परिवार  में ६ लड़कियां थी और पिता निहायत ही गरीब..... सुदीप को लगा कि मेरे लिए मिशाल कायम करने और अपने मन मुताबिक शादी करने का इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिल सकता...... उसने नेहा के पिता को शादी के लिए हाँ कर दी.... और अपनी मंशा से उन्हें अवगत करा दिया...... नेहा के पिता ने जब सुना कि बटेऊ बिना बारात और बिना दहेज़ के शादी करना चाहते हैं तो उन्हें लगा कि बिन मांगे मन्नत पूरी हो गयी...... 
सुदीप के घर वालों ने अनमने मन से उसका विवाह कर दिया ...... सुदीप ने वैवाहिक जीवन में भी अपनी पढाई को जरी रखा और वो अधिक अच्छे ओहदे के लिए प्रयास करता रहा..... उसकी पत्नी नेहा उसे पढने को मना करती और पूर्णरूप से घर परिवार ने रच बस जाने का दबाव डालती...... साथ ही रोज़ डिस्को ,,,रेस्तरो जाने की जिद्द करती...... सुदीप के मन में जैसे एक फ़ांस सी गड गयी......अब छोटी छोटी बातों पर विवाद होने लगे......उस दिन तो हद ही हो गयी..... सुदीप की तबियत खराब थी..... और नेहा ने खाना नहीं बनाया था..... सुदीप के कहने पर जबाब मिला आपकी तो रोज़ ही तबियत ख़राब रहती है...... मैं क्या सारा दिन चूल्हे में खटने के लिए हूँ.... ढाबे से खाना माँगा लो...मेरा आज खाना बनाने का बिलकुल मन नहीं है...... विवाद बढ़ गया तो नेहा ने अपना बैग सम्भाला और मायके चली गयी.....
हफ्ते बाद भी नेहा नहीं आई...... आया तो कोर्ट का नोटिस..... सुदीप ने नोटिस पढ़ा जिसमे उसके ऊपर दहेज़ उत्पीडन के चार्जेस लगे थे.... उसे याद आने लगा कि कैसे उसकी सादगीपूर्ण शादी को मिडिया में भी कवरेज मिला था...... आँखे आसुंओ से तर बतर थी और पिता का चेहरा आंसू की बूंदों में तैर रहा था.......


रचनाकार : संदीप तोमर 
पता :
संदीप तोमर 
डी-२ / १ 
जीवन पार्क , उत्तम नगर 
नई दिल्ली-११००५९ 
दूरभाष:
8377875009

Monday, July 27, 2015

"जहाँ मैं हूँ..."
(उपन्यास)-1 
चार भाई बहन में सबसे छोटा था सुदीप....जन्म से पहले कच्चे मकान में रहता था परिवार... सुदीप के आने की सुचना मात्र के समय से नया पक्का मकान बनने लगा.. आलम देखिये कि इधर पक्का मकान बनकर तैयार हुआ और उधर शिशु का आगमन हुआ.. साढ़े पांच किलो वजन का हस्ट पुष्ट बालक...मोहल्ले में शोर मच गया कि बड़ा मोटा-ताज़ा बेटा हुआ है... नए मकान में नयी खुशियां...पिताजी को लगा कि लड़का भाग्यवान है..जिसके आने की खबर मात्र से मेरा नया मकान बन गया.. सारे परिवार का ध्यान जैसे उस एक नवजात बालक पर केन्द्रित हो गया...सुप्रिया भाई के पास आती और उसे छूकर चली जाती.. माँ को देखती तो मायुस हो जाती... उसे लगता माँ अब मेरे लिए खाना भी नहीं बनाती..ऐसा क्या हुआ माँ को.. और ये बच्चा जिसे सब मेरा छोटा भाई कह रहे हैं ये क्यों आया.. अब माँ किसी को नहलाती भी नहीं... दादी कहती है- बेटा अभी ४० दिन माँ जच्चा घर में रहेगी...सुप्रिया हर बात पर गौर करती जैसेउसे सब पारिवारिक दायित्व अभी से शिख लेने हैं सुप्रिया बमुश्किल साढ़े तीन चार साल की होगी.. ६ दिन बाद घर में त्यौहार जैसा माहौल था. 
सुप्रिया ने दादी से पूछा -"दादी आज क्या हो रहा है?'
"मेरी बच्ची आज तेरे भाई की छटी है.."
"ये छटी क्या होती है दादी.."
"जब कोई बच्चा होता है तो छ: दिन बाद जच्चा बाहर निकलती ही..उसे छटी कहते हैं.."
"आज क्या होगा ?"
"आज सब घर परिवार वालो का खाना हमारे घर में होगा..डाल चवन और रोटियां बनेगीं ..तेरी सारी दादियाँ और ताइयाँ खाना बनायेंगी..."
"दादी मैं भी खाना बनाउंगी"
"मेरी बच्ची अभी तू छोटी है. जब बड़ी हो जाएगी तो सारा काम सीख लेना..लड़कियों के भाग्य में तो सारे काम लिखें हैं..."
दादी मेरा भाई भी खाना खायेगा."
"पहली.. वो अभी ६ महीने माँ का दूध पिएगा.. फिर उसे ऊपर का कुछ खिलाना शुरू करेंगे..अभी तो तू अपने बड़े भाई सुकेश और छोटे भाई नीलू के साथ खाना खाना.."
दादी सुकेश भैया मुझे मारते हैं..मैं उनके साथ नहीं खाने वाली... और नीलू की नाक बहती रहती है.."
"चल पगली वो तेरे भाई हैं..ऐसे नहीं बोलते... एक तेरा बड़ा भाई है और दूसरा छोटा..."
"दादी मेरा भाई तो छोटू है ..मेरा छोटू.. हम उसका नाम छोटू रख दें.."
"चल पगली, छोटू कोई नाम थोड़े ना होता है.. "
"एक बात बता दादी ये तू मुझे चल पगली--चल पगली क्यों बोलती है..मैं दादा से तुझे पिटवाउंगी..."
"अच्छा तेरा दादा मुझे पीटेगा?उसे रोटी नहीं खानी "
जैसे जैसे सुदीप थोडा बड़ा होता गया.. सुप्रिया का दुलारा बनता गया.. माँ ने चालीस दिन बाद घर के काम देखने शुरू किये.. तो सुप्रिया सुदीप को गोद में लेकर बैठने लगी.. स्कूल तो अभी सुकेश के अलावा कोई जाता नहीं था..सुदीप ने अपनी उम्र से पहले ही बैठना और घुटनों के बल चलना शुरू कर दिया..नौ महीने का हुआ तो खड़ा होकर चलने लगा.. पास पड़ोस की औरतें आती तो कहती- अरे देखो सुदीप कैसे पैर उठाता है.. अमूमन बच्चे 1 साल के होते हैं तो पहला कदम रखते हैं.. जब सुप्रिया किसी को भाई के बारे में कुछ कहते सुनती.. तो कहती- "चाची मेरे भाई को नजर मत लगाओ.."
चाचियाँ उसकी बात पर हँस देती. अभी सुदीप ११ महीने का हुआ ...उसे बुखार हुआ ..सारा शरीर आग सा ताप रहा था.. माँ ने उसे डाक्टर के पास ले जाने का उपाय सोचा.. पिताजी ऑफिस गए हुए थे.. दादी ने बीच में अडंगा लगा दिया.. -"तू घर की बहु है अकेले लड़के को लेकर जाएगी.. जयें का पानी उबाल कर पिला दे.. ठीक हो जायेगा..बड़ी आई डाक्टर के पास जाने वाली.."
माँ दादी के सामने बोलती नहीं थी.. दादी ने डाक्टर के पासा नहीं जाने दिया.. शरीर का ताप बढ़ता ही जा रहा था.. माँ ठन्डे पानी की पट्टी उसके सर पर रखती.. बदलती.. शाम हुई तो पिताजी घर आये,, बेटे को हाथ लगाया बदन अभी भी ताप रहा था.. माँ को साईकिल पर बैठा शहर के डाक्टर के पास ले गए.. पैर लटके हुए थे कोई हलचल नहीं हो रही थी.. डाक्टर के चेक अप किया ... और बताया --"मास्टर साहब इसे पोलियो हुआ है.."
पिताजी अध्यापक थे तो पोलियो का नाम सुन रखा था..माँ इस नाम से अनजान थी.. पुच बैठी -"डाक्टर साहब ये पोलिय क्या होता है?"
बहन जी जिसे लोग आम बोल चाल में फालिस कहते हैं.. अब ये लड़का चल फिर नहीं पायेगा.., मैं बुखार की दावा दे देता हूँ..." यहाँ इसका अभी कोई इलाज नहीं.. हाँ जिले में एक डाक्टर सलूजा हैं वो कुछ कर दें तो आपका भाग्य.. ये बीमारी बड़ी ख़राब है ..इससे नसें मर जाती है खून का दोर बंद हो जाता है.."
माँ तो रोते ही लगी... रोते रोते बुरा हाल था.. शाम घिर आई थी.. पिताजी माँ और सुदीप को लेकर घर आये.. घर आकर दादी ने पूछा क्या हुआ? पिताजी हरीप्रसाद ने बताया -माँ तेरे पोते को फालिश मारा है.."
दादी ने सुन तो रोना शुरू.. सुप्रिया सब देख रही थी.. बोली किसी से नहीं उसे समझ नहीं आया कि उसके छोटू को क्या हुआ? बस समझ रही थी कि कुछ गलत हुआ है.. उसका छोटू रोये जा रहा था.. माँ से पूछा _माँ मेरे छोटू भाई को क्या हुआ ..ये रोता चुप क्यों नहीं होता..?"
माँ ने बेटी को गले लगा लिया..-"कुछ नहीं मेरी बच्ची ..बुखार है ठीक हो जायेगा.."
"माँ ये तो आज रोज़ की तरह पैर भी नहीं चला रहा.. माँ, भाई ठीक तो हो जायेगा ना?"
माँ ने बेटी से सुना तो उसकी रुलाई फूट गयी...सुप्रिया को समझ ही नही आया कि माँ क्यों रो रही है...
डॉ. भार्गव के सुझाव को मान पिताजी सुदीप को लेकर जिले के नामी गिरामी डॉ.सलूजा के पास गए..डॉ सलूजा के क्लिनिक में पोलियो के मरीजों की भीड़ थी... पर्ची कटवा कर माँ और पिताजी अपनी बारी का इं तज़ार करने लगे.. माँ बेहद परेशान...पिताजी चिंताकुल.. अपनी बारी आने पर सुदीप को ले डॉ के केबिन में गए.. डॉ ने चेक अप किया और बड़े अनोखे अंजाद में बोला-" भाई साहब पोलियो बेहद खतरनाक बीमारी है..और इस बच्चे को इसका असर दायें पैर में ज्यादा है.. असर बाएं पैर में भी है..इसका इलाज लम्बा चलेगा.."
डॉ साहब ये रोग कैसे होता है ? क्या ये बुखार में हवा लगने वाला रोग है?"
"नहीं ऐसा कुछ नहीं है दरअसल लोग इस रोग के लक्षण और वजह दोनों ही नहीं जानते. इसलिए गलत फहमी पाल लेते है...पोलियो एक संक्रामक रोग है जो पोलियो विषाणु से मुख्यतः छोटे बच्चों में होता है। यह बीमारी बच्चें के किसी भी अंग को जिन्दगी भर के लिये कमजोर कर देती है। "
"लेकिन ये होता कैसे है "--पिताजी अध्यापक थे तो उन्हें ये सब जानने की उत्सुकता थी...
"मल पदार्थ से पोलिया का वायरस जाता है। ज्यांदातर वायरस युक्त भोजन के सेवन करने से यह रोग होता है। यह वायरस श्वास तंत्र से भी शरीर में प्रवेश कर रोग फैलाता है।"
डॉ. साहब ये तो आप एक दम नयी बात बता रहे हैं..."
जी भाईसाहब दरससल लोगो को इस बारे में अल्प ज्ञान है इसलिए भ्रांतियां पाल लेते हैं.."
"लेकिन डॉ साहब ये नसों को मारता है और हड्डिय भी कमजोर करता है.."
"नहीं,, पोलियो मॉंसपेशियों व हड्डी की बीमारी नहीं है बल्कि स्पायइनल कॉर्ड व मैडुला की बीमारी है। स्पाइनल कॉर्ड मनुष्य का वह हिस्सा है जो रीड की हड्डी में होता है।"
इसका मतलब तो ये हुआ कि स्पाइनल कॉर्ड की बीमारी होने के कारण मरीज ठीक नहीं हो सकता..."
"ऐसा भी नहीं है.. वैसे तो लोगो का मानना है कि ये रोग लाईलाज है लेकिन मैं एक डॉ. हूँ मेरा फर्ज है कोशिश करना.."
"लेकिन क्या आप इसके इलाज की गारंटी लेंगे.."
"देखिये...डॉ. कोई भगवान् नहीं होता... उसका फर्ज होता है कोशिश करना"
"अच्छा डॉ. साहब ये लकवा जैसा तो नहीं है?"
"लोगो में ये भी भ्रान्ति है कि ये लकवा है ... पोलियो वासरस ग्रसित बच्चों में से एक प्रतिशत से भी कम बच्चों में लकवा होता है।"
"पोलियों जायदातर बच्चो को ही क्यों होता है?"
"ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बच्चों में पोलियों विषाणु के विरूद्व किसी प्रकार की प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती है इसी कारण इसका वायरस बच्चों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है.."
"डॉ साहब आप मेरे बच्चे को ठीक कर दीजिये..."
"कोशिश करना मेरा फर्ज है...आप बाहर काउंटर पर फीस जमा करा दीजिये.. मैंने दवाई लिख दी है..मेरा कम्पौंडर दवाई बना देगा, "
“जी डॉ साहब."-.कहकर पिताजी बाहर आये.. .कम्पौंडर ने दवाई का पुडा हाथ में थमा दिया और १०० रूपये फीस मांगी.. पिताजी की तन्खवाह बमुश्किल १५० रूपये माहवार.. और डॉ की एक विजिट की फीस १०० रूपये.. सुनकर पिताजी कुछ चौंकें. पूछा-"ये फीस पूरे महीने की है?"
"नही भाई साहब, ये एक बार की फीस है... अभी पंद्रह दिन की दवाई दी है अगली विजिट पर डॉ साहब देखेंगे कि दवा असर कर रही है या नहीं.. असर करेगी तो ये ही दवा दी जाएगी नहीं तो फिर दवा बदल देंगे.." 
..फीस जमा करके पिताजी बाहर आये... बस पकड़ कर घर वापिस पहुंचे.. दिमाग घूमता रहा... १०० रूपये फीस ...और महीने में कमाई १५० रूपये.. और तीन बच्चे .... साथ में माँ और पिताजी भी.....बड़े भाइयों का कोई सहारा नहीं.. कैसे होगा ..कहाँ से पैसा आएगा.. कैसे इलाज होगा...लगातार दो साल तक डॉ. सलूजा का इलाज चलता रहा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ..पिताजी ने अपना और बच्चो का पेट काटकर इलाज में पैसा लगाया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला तो कहीं और इलाज कराने का सोचा..
किसी ने बताया कि दिल्ली के नारायण विहार में एक डाक्टर हैं जो पोलियों का इलाज करते हैं.. माँ पिताजी दोनों सुदीप को लेकर नारायण विहार आ गए.. डाक्टर से बात हुई फिर वही जबाब मिला... डॉक्टर भगवान नहीं होता ... कोशिश ही कर सकता है.. आपको बच्चे को लेकर हफ्ते में दो बार आना होगा.. 
"आप इलाज कैसे करते हो?"-- पिताजी ने जिज्ञासा प्रकट की..
"हम बिजली की मशीनों से शरीर में झटके देकर खून का दौर पुनः चालू करने की तकनीक से इलाज करते हैं इससे नसों में जमा खून फिर से शरीर में प्रवाहित होना शुरू हो जाता है"--डॉ मुद्गल ने बताया...
पिताजी को अजीब लगा लेकिन क्या कर सकते थे.. औलाद का दुःख ही माँ-बाप के लिए सबसे बड़ा दुःख होता है.. एक आश की किरण की तलाश में मास्टर हरी प्रसाद जगह जगह की खाक छान रहे थे..बस बेटे को कहीं से आराम लग जाए...ये ही उम्मीद लेकर उन्होंने इलाज करने का फैसला कर लिया..
अब समस्या थी कि प्राइवेट स्कूल की नौकरी से छुट्टी लेकर कैसे इलाज कराया जाये.. बड़े ही मुस्किल हालात थे.. माँ मालती देवी ने ये जिम्मा लेने की ठानी..लेकिन चार-चार बच्चो का पालन पोषण करना जिनमे से तीन अब स्कूल जाने लगे थे.. और फिर १३० किलोमीटर दूर आना-जाना एक ही दिन में करना.. बड़ा ही दूभर काम था..सास ससुर का खाना बनाना.पशुओं का चारे का प्रबंध करना.. कैसे होता होगा ये सब... दादी को लगा कि बहु अपने बेटे के चक्कर में मुझ पर काम का बोझ न बढ़ा दें इसलिए उसने अपने बड़े बेटे के पास जाने का फैसला कर लिया.. मालती देवी बेटे को लेकर आई तो सास ने फरमान सुना दिया अपने बच्चो का खुद इंतजाम करना.. मैं किसी की कोई आया या नाइन नहीं हूँ.. जो इन टाब्बरों को सारे दिन हांकती रहूँ..उस दिन सास बहु में झगडा हुआ.. मालती देवी को लगता कि सास डाक्टर के पास जाने देती, समय पर बुखार का इलाज हो जाता तो आज मेरे सुदीप को ये सब न होता.. 
रात को हरिप्रसाद ने पत्नी को समझाया कि इस रोग में बुखार बाद में होता है ये बुखार से होने वाला रोग नहीं है.. तुम क्यों माँ से लड़ रही हो.. और अगर उसे भाई के पास ही रहना है तो रहने दो.. हमें अपने बच्चो की परवरिश खुद करनी हैं..
अगले दिन दादी बड़े बेटे के यहाँ चली गयी..लेकिन दादा ने अपने छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला किया..
दादा अपने भाइयों में सबसे बड़े थे..उनसे छोटे ६ भाई और तीन बहने थी.. एक बड़े भाई की म्रत्यु जवानी में ही हो गयी थी..उनकी दो बेटियां ही थी..खुद की पांच संतान ... तीन बेटे और २ बेटियां.. दादा ने ७ बच्चों की परवरिश की ... ४ बेटियों की शादी भी की.. दो बेटे बड़े थे और हरी प्रसाद सबसे छोटे.. परिवार को गॉव गमांड में परिवार को उसके नाम से जाना जाता.. इलाके का प्रतिष्ठित परिवार.. दादा बेहद ही सीधे इंसान.. इनके सीधे होने के चलते बड़े बेटे ने घर की सब सम्पति पर अपना कब्ज़ा किया हुआ था.. मझले बेटे ने सुगर मिल में कामदार की जॉब पकड़ ली.. और खेती बड़ी का काम छोटे बेटे के जिम्मे आ गया.. उनकी पढाई लिखाई पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.. सब अपने अपने चक्कर में लगे रहते.. हरी प्रसाद जब तीसरी क्लास में पढ़ते थे तब से ही खेती में लगा दिया गया ...किसी तरह पढ़ते रहे.. दसवी क्लास में थे तो शादी हो गयी.. फिर यहाँ वहां नौकरी करते हुए घर का गुजरा करने लगे,, १२ वी की तो भविष्य की चिंता होने लगी.. अब बड़े दोनों भाई फसल बटवाने लगे तो मालती देवी खेती में पूरा हाथ बटाती.. प्रिगनेंट रहती तो भी खेती का काम देखती..
मालती देवी का सहयोग न होता तो हरी प्रसाद पढ़ भी पाते... नीलू के जन्म के समय तक वे टीचर ट्रेनिंग कर चुके थे..सुदीप के जन्म से कुछ दिन पहले ही अध्यापक बने थे..मकान भी बिना किसी के सहयोग के बनाया था..
माँ के बड़े भाई के यहाँ जाने के फैसले से हरी प्रसाद आहत जरुर हुए थे.. लेकिन हिम्मत नहीं हारी थी..
मालती देवी बेटे को लेकर डाक्टर के पास जाती.. हरी प्रसाद स्कूल से आते तो बच्चे भी आ चुके होते.. वो स्टोव पर खाना बनाते.. सुप्रिया पिताजी को रोटी बनाते देखती तो अन्दर तक दुखी हो जाती.. उसने कहा-"पिताजी मैं रोटी बनाउंगी.. "
हाँ बेटी तू बड़ी हो जा,, फिर तुझे ही तो ये सब करना है.."-पिताजी आहत मन से कहते...
एक बच्ची बिना उम्र के बड़ी हो रही थी.. तीसरी क्लास में आई तो नन्ही अँगुलियों से तवे पर रोटियां सकने लगी..कच्ची पक्की रोटियां बनाती.. पिताजी बड़े चाव से खाते .. बच्ची का हौसला बढता.. छोटी होते हुए भी सुप्रिया पर काम की जिम्मेवारी बढ़ने लगी.. साफ सफाई.. खाना.. बर्तन सब करती.. माँ के आने से पहले तक एक भी काम न छोडती.. माँ को भी फक्र होता कि मेरे बच्चे कितने नेक हैं.. सुकेश जरुर सुप्रिया को तंग करता लेकिन फिर भी सब भाई बहनों में बड़ा प्यार .. पिता के अध्यापक होने का दबाव उनके मन पर था.. कोई भी गलत काम करने से पहले मन में आ जाए कि एक टीचर के बच्चे हैं लोग क्या कहेंगे.. ऐसे ही माहौल में परवरिश हो रही थी..
. सुदीप भी अब ५ साल का हो गया लेकिन पेट के बल ही सरकता... हाँ बस इतना सुधार आया कि अब घुटनों के सहारे घिसड़कर जमीन पर चल लेता.. मोहल्ले के कुछ बच्चे उसके दोस्त बन गए.. महेश और राजेंद्र उसके हमउम्र थे.. तो पहले उनसे ही दोस्ती हुई..छोटे मोटे खेल खेलते.. सुदीप का दिमाग तीव्र गति से चलता ये बात हरी प्रसाद को समझ आने लगी थी.. उनका मन कहता कि बच्चा थोडा भी खड़ा होने लगे तो इसे स्कूल भेजा जाये..
सुप्रिया भाई का ख्याल रखती..जिस दिन उसकी छुट्टी होती और माँ को डाक्टर के पास नहीं जाना होता तो सुप्रिया ही भाई को नहलाती उसके कपडे बदलती..
कोई भी इलाज सुदीप पर कारगर नहीं हो रहा था.. माँ पिताजी सब परेशान..किसी ने बताया कि बुढाना कस्बे में बस स्टैंड के पास एक देशी वैद है .. जो इसी तरह के मरीजों का इलाज करता है.. सुदीप को इलाज के लिए वहां ले जाने का फैसला किया गया...
एक सुबह मास्टर हरी प्रसाद और मालती देवी सुकेश को लेकर बुढाना डॉ सुबोध के क्लिनिक पहुंचे.. सुदीप अब बातों को समझने लगा था.. वो सब बातों का बारीकी से निरीक्षण करता.. कहते हैं कि जब किसी का अंग भंग होता है तो उनकी संवेदना का स्तर बढ़ जाता है और उसकी उस अंग विशेष की ताक़त भी मस्तिष्क में चली जाती है..चुनांचे सुदीप का मस्तिष्क भी शीघ्रता से परिपक्व हो रहा था..हरी प्रसाद ने सुदीप को गोद से उतार एक बैंच पर बैठा दिया...डॉ सुबोध ने बताया कि ये लड़का तीन साल में सड़क पर दौड़ेगा... और आप यही इसी बेंच पर बैठे हुए देखोगे..उन्होंने कुछ मरीजों से बात करायी.. उनके माँ-बाप से बात करायी.. जिन्होंने बताया कि हमारा बच्चा भी पेट के बल सरकता था..इसे आज डॉ साहब ने इतना कर दिया कि अब धीरे-धीरे चलने लगा है.. सुदीप ये सब बाते सुन रहा था तो उसने कल्पना की कि एक दिन मैं भी और सब की तरह चल पाउँगा..
इलाज शुरू हो गया था.. हर तीसरे दिन डाक्टर बुलाता कुछ अजीब से तेल की मालिश करता और फिर पट्टियों को लपेट देता... पट्टियों के नीचे लकड़ी की खरपच्चिया होती जो सुदीप को चुभती और उसे परेशान करती.. उसका मन बाहर दोस्तों के साथ खेलने का करता..अब वो दीवार पकड़ कर थोडा चलने का प्रयास करता.. डॉ ने बताया कि इसे एक गडुलना लाकर दो ये उसे पकडकर चलेगा.. पिताजी बढई से एक गडुलना बनवाकर ले आये.. सुदीप अब गडुलने की सहायता से चलने का प्रयास करता... हर पंद्रह दिन बाद डॉ सुबोध दोनों पैरों पर प्लास्टर कर देता.. और फिर दो तीन दिन उसका चलना फिरना बंद हो जाता..इस इलाज से एक फायदा ये हो रहा था कि अब वो घर से बाहर कुछ कदम रखता ...उसे अनुभव होता कि दुनिया इस चारदीवारी से भी आगे है... माँ ने पिताजी को कहकर एक हिंदी का कायदा मंगवा दिया और एक स्लेट... अब सुदीप का स्कूल घर पर ही लगने लगा.. मध्यमा पास माँ उसे क ख ग पढ़ाती... स्लेट पर लिखाती... उसका कई बार मन नहीं होता तो माँ सख्ती दिखाती.... उसका पढाई में मन नहीं लगता... माँ घर के काम काज करती तो साथ में पीढ़े पर सुदीप को बैठा लेती.. और उससे पढने को कहती.. प्लास्टर और पट्टियों के बीच जूझता बालक कैसे पढाई में मन लगाये.. क्लास में तो मास्टर का ध्यान ज्यादा बच्चो पर रहता है लेकिन यहाँ तो एक अध्यापक और एक ही छात्र.. वो निगाह भी बचाए तो कैसे... माँ सख्ती करने लगी... हिंदी के कायदे का काला पन्ना जो कीस के भी होश उड़ा दे... माँ चाहती कि उसे वो काला पन्ना कंठस्थ हो... सुदीप को काले पन्ने के लिए मार भी लगती...तब सुदीप को स्कूल गयी बहन सुप्रिया की याद आती.. दीदी घर पर होती तो उसे पिटाई से बचा लेती.. वो दीदी के स्कूल से आने की प्रतिक्षा करता... सुप्रिया स्कूल से आती तो ही वो खाना खाता..
उम्र बढ़ने से शरीर का वजन भी बढ़ रहा था.. माँ डॉक्टर के पास जाती तो रिक्शा न लेकर पैदल ही जाती.. सात साल की उम्र के बच्चे को गोद में लेकर चलाना ऊपर से पट्टी और प्लास्टर का भी वजन.. माँ मुश्किलों से उसे ढाई-तीन किलोमीटर दूर बस अड्डे तक ले जाती और वहां से बस से बुढाना जाती... अब ये सब जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया था..
वीरेंदर चाचा स्कूल में पढ़ते थे.. यशवीर चाचा फ़ौज में थे.. लेह में पोस्टिंग हुई ..वो फ़ौज से छुट्टी आये तो बादाम और अखरोट लाये.. सुदीप बहुत खुश हुआ.. उसने बादाम खाए, अखरोट उसे पसंद नहीं आये...चाचा जितने दिन छुट्टी आते तो रोज़ सुदीप से मिलने आते.. वो बहुत खुश होता.. चाचाजी सबको प्यार करते लेकिन सुदीप को कुछ ज्यादा..
चाचाजी की शादी हुई लेकिन सुदीप को पट्टियाँ बंधी होने के कारण कोई उसे बारात में नहीं ले गया..वो उस दिन बेहद दुखी हुआ..रोता रहा.. उसे यशवीर चाचा से बहुत लगाव था.. वो भी बारात में जाना चाहता था..उसने उस शाम खाना भी नहीं खाया..वो सोचता रहा कि मैं यूँ इस हाल में ना होता तो मैं भी सुकेश भैया और नीलू की तरह नए कपडे पहनता बारात का खाना खाता..रोत्ते रोते कब नींद आई होगी पता ही नहीं चला.
एक दिन माँ डाक्टर के पास से सुदीप को लेकर आ रही थी.. रास्ते में वीरेंदर चाचा मिले.. बोले- “भाभी सुदीप को मेरी साईकिल पर बैठा दो.मैं घर ही जा रहा हूँ.” ..माँ ने उसे साईकिल पर बैठा दिया.. चाचा उसे लेकर चल दिए, अभी गॉव में घुसे ही थे कि देखा कुछ बच्चे शोर मचा रहे थे.. साईकिल रोक वो उन्हें देखने लगे.. बच्चे एक टिड्डे को पकड़ने के लिए शोर मचा रहे थे.. चाचा भी उस मण्डली में शामिल हो गए...टिड्डा सुदीप की कमर पर आकर बैठा .. उसने जैसे ही उससे डरकर कमर को हिलाया.. साईकिल ने अपना बैलेंस खोया और साईकिल और सुदीप दोनों धडाम नीचे... बाए हाथ की कोहनी की हड्डी टूट गयी.. चाचा घबराकर भाग गए,.. सुदीप रोये जा रहा था.. माँ आई तो बहुत तमाशा हुआ.. चाचा जाकर खेत में छुप गए थे...अब खचेडू चुढ़े को बुलाया गया.. उसने सोचा कि कोहनी उतरी है हिलाडुला कर कुछ किया और लुडपुड़ी बनवाकर बांध दी..दर्द के मारे वो कराहता रहा..अलगे दिन सुबह होते ही पिताजी सुरेश डाक्टर के यहाँ ले गए..हाथ पर भी प्लास्टर बांध दिया... 
सुदीप हाथ और पैर दोनों पर प्लास्टर देख रोता रहता..
माँ चाहती कि वो पढ़े.. अब हिंदी के साथ साथ गिनती का भी जोर होने लगा.. गिनती उसे फट से याद हो जाती.. २० तक के पहाड़े भी रट गए.. छोटे मोटे गुना भाग जोड़ घटा भी सीख गया. इन सबमें सुप्रिया का उसे भरपूर साथ मिलता..हाथ का प्लास्टर कट गया था..लेकिन अब कोहनी का मुड़ना बंद .. रोज़ गर्म पानी की सिकाई.. कभी कभी सुप्रिया भी झल्ला जाती कि सारा काम मेरे जिम्मे दिन में चार चार बार सिकाई... छोटी बच्ची ऊपर से काम का इतना बोझ.. लेकिन फिर सोचती मेरा भाई है जल्दी ठीक हो जायेगा.. ...
डॉ.सुबोध प्लास्टर के बाद पंद्रह दिन पैर खुले छोड़ देता ताकि जोड़ जाम न हो जाये.. पंद्रह दिन फिर पैरों की सिकाई होती और पैर को खोलने के लिए व्यायाम करना पड़ता.. सुदीप एक भी कम रोज़ रोज़ करने से उकता जाता.. लेकिन माँ कि सख्त हिदायत थी कि ठीक होना है दूसरे बच्चों की तरह चलना है तो ये सब करो.. 
माँ खेत का काम करती पशुओं का काम करती.सुदीप घर पर अकेला बोर हो जाता... बसंती दादी..उसे अपने दालान में बुला लेती.. बसंती दादी और हरी प्रसाद का एक ही दालान था बस बीच में एक दरवाजा लगा था.. जो सिर्फ रात में ही बंद होता.. दोनों परिवारों का एक ही नल था जिस पर दोनों परिवारों का काम होता था.. नहाना धोना,... बर्तन सब.. बिजली भी सिर्फ मास्टर हरी प्रसाद के यहाँ ही थी.. रात में दोनों परिवारों के बच्चे वहीँ पढ़ते थे..
इस बीच दादी की तबियत ख़राब चल रही थी.. माँ पिताजी ताउजी के यहाँ जाते.. उनकी सेवा करते.. ताई माँ मालती देवी के सामने दिखाती जैसे खूब सेवा करती है लेकिन वैसे कुछ नहीं करती.. माँ के दादी के पास जाते ही वहीं आ जाती ताकि सास-बहु मेरी बातें न करने लगे.. माँ दादी के बाल धोती.. कंधी करती उसके कपडे बदलती..कभी सुकेश भैया दादी से मिलने जाते तो दादी उसे ताऊ के बच्चो के कंचे दे देती और कहती मेरे छोटे पोते को दे देना..
एक दिन खबर आई कि दादी मर गयी.. उस दिन सब लोग ताऊजी के यहाँ गए.. सुदीप को खाना बसंती दादी ने खिलाया.. सुदीप को दादी के अंतिम दर्शन भी नहीं हुए.
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अभी हाथ का प्लास्टर खुला नहीं था......माँ डॉ. सुबोध से सुदीप का इलाज करवाकर आ रही थी... पैसे बचाने के चलते उसने रिक्शा नहीं किया.. वो उसे गोद में ले वापिस आ रही थी.. रास्ते में फाटक पड़ते थे.. ट्रेन आने का समय था.. फाटक बंद... ऐसी स्थिति में अक्सर लोग फाटक के नीचे से निकलकर आते जाते.. माँ ने समय बचने के लिए फाटक के नीचे से निकलने का प्रयास किया.. एक फाटक पार करके दूसरा फाटक पार ही किया था कि पैर एक पत्थर से टकराया... माँ का संतुलन बिगड़ा तो उसने अपनी कोहनी नीचे टिका दी ताकि सुदीप के हाथ का प्लास्टर नीचे न लगे.. माँ जैसे-तैसे संभली दो कदम ही चली थी कि पैर के नीचे केले के छिलके के आ जाने से माँ का संतुलन फिर बिगड़ गया.. माँ ने फिर से कोहनी नीचे टिका दी..माँ की कोहनी लहुलुहान हो गयी..सुदीप की आँखों में आंसू थे.. वो किसी से कुछ कहने कि स्थिति में नहीं था लेकिन वो इन सब बातों से सीख रहा था और उसका मानसिक विकास और सामजिक विकास इन घटनाओं पर निर्भर था... 
माँ के हाथों की चोट उसे परेशां कर रही थी.. 
दो दिन बाद फिर डाक्टर की विजिट थी....माँ जा नहीं सकती थी..पिताजी ने जाने का फैसला किया.. स्कूल से छुट्टी ली और बुढाना डॉ. सुबोध के पास चले गए..डॉ ने हाथ और पैर का प्लास्टर काट दिया और पैरों पर पट्टियाँ बांध दी.. पिताजी वहां से चलने के लिए बस स्टैंड पर आ गए.. अभी बस नहीं आई थी.. स्टैंड के पास एक बुजुर्ग और एक लड़की बैठे थे... पिताजी ने सुदीप को उनके पास बैठा दिया.. बुजुर्ग और पिताजी आपस में बाते करने लगे..बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो घर परिवार की बातें होने लगी..परिचय हुआ.. इस बीच बस आ गयी.. बस लगभग भरी हुई थी.. पिताजी और बुजुर्ग दो वाली एक सीट पर बैठ गए.. सुदीप को उस लड़की की गोद में बैठा दिया...उसका नाम सुधा था.. एकदम सीधी सादी लड़की.. सुधा ने सुदीप के पैरों पर पट्टियाँ लिपटी देखी और गले में पट्टी डालकर हाथ उसने डाले हुए.. वो थोड़ी मायूस सी हुई.. उसने पूछा-"तेरे पैर में ये पट्टी क्यों बंधी हैं."
सुदीप चुप बैठा रहा... सुधा ने फिर उत्सुकता दिखाई...पैर को हाथ लगाकर कहा-"दुखता है"
सुदीप ने रूखेपन में जबाब दिया-"नहीं"
आगे उनमे कोई बातचीत नहीं हुई.. पिताजी और बुजुर्ब बात करते रहे..शहर आने पर वो लोग उतरे.. पिताजी ने बस से उतरकर सुदीप को पास की दुकान पर खड़ी साईकिल पर बिठाया और गॉव आ गए..
शाम को पिताजी ने माँ को बताया-"आज बस में एक बुजुर्ग मिले उनकी पोती उनके साथ थी.. उनका रिश्ता बड़े भाई के मझले बेटे अखिल से तय हुआ था.. लेकिन भैया भाभी ने रिश्ता तोड़ दिया..बुजुर्ग ने अपनी पोती से मेरे पैर छुवाए.. मैंने उन्हें रिश्ते की हामी भर दी..कल भाई से बात करता हूँ..."
अगले दिन पिताजी ताउजी के पास गए और रिश्ते के बारे में पूछा, ताउजी ने कहा –“हरीप्रसाद तेरी भाभी मना कर रही है..
पिताजी ने कहा- "भाई मैंने जुबान दी है अब शादी तो वही से होगी..."
बड़े भाई ने छोटे भाई की जुबान का सम्मान करते हुए रिश्ता पक्का कर लिया... और अखिल की शादी सुधा से हो गयी..सुधा का परिवार गरीब था ... वो बारात का स्वागत बहुत अच्छे से नहीं कर पाए तो परिवार हरी प्रसाद से नाराज हुआ..
सुधा ताई की दूसरे नंबर की बहु थी..गरीब परिवार की लड़की ....कम दहेज़ ला पाई..उम्र भी कम ...बहु सास को पसंद नहीं आई.. अखिल का भी व्यवहार रुखा था.. एक लड़की अनजान घर में अपना घरबार सब छोड़कर जाती है.. एक पति अगर सही से व्यवहार करे तो उसके सब गिले शिकवे ख़त्म हो जाते हैं.. सुधा खुद को प्रताड़ित महसूस करती...लेकिन उसके अन्दर विरोध का स्वर ना था..लिहाजा रिश्ता टूटने के कगार पर आ गया.. सुधा का भाई आया.. परिवार ने बहु को रखने में अपनी असमर्थता जताई...हरी प्रसाद को बुलाने के लिए छोटे बेटे प्रदीप को गॉव भेजा गया... मालती देवी सुदीप को डाक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार कर रही थी..उन्होंने प्रदीप को कहा---“तुम सुदीप को लेकर जाओ तेरे चाचा और मैं आते हैं”..सुदीप को प्रदीप की सायकिल पर बैठा दिया गया..अभी शहर से ३०० मीटर कि दूरी बची होगी कि सुदीप का पैर सायकिल के पहिये में आ गया..वाल्वबॉडी पैर में घुसी तो सायकिल चलना मुस्किल..सुदीप रोने लगा.. प्रदीप ने सायकिल रोकी.. लहुलुहान पैर देखा तो वो घबरा गया.. जैसे जैसे डॉ. सुरेश के क्लिनिक पहुंचे.. डॉ. सुरेश ने पट्टी बंधी लेकिन खून नहीं रुका.. तब तक हरी प्रकाश और मालती देवी भी आ चुके थे.. अब सुदीप को शिवमूर्ति के पास डॉ. राजेंद्र के पास ले जाया गया..वहां उसके पैर में ४ टांके लगे.. सुदीप को लेकर मालती देव घर आ गयी.. हरी प्रसाद अपने भाई के घर पहुंचे.. अखिल को समझाने के प्रयास होने लगे.. अखिल टस से मस होने को तैयार नहीं हुआ.. हरिप्रसाद असमंजस में पड़ गए..जब उन्हें कुछ रास्ता न सुझा तो उन्होंने कहा- “जब तक कुछ तय नहीं हो जाता सुधा गॉव में रहेगी.”. बहुत हा-हुल्ला के बाद सुधा गॉव आ गयी.. 
सुदीप की संवेदना इस तरह की घटनाओ से प्रभावित हो रही थी..बिना स्कूल जाये उसकी सामाजिक पाठशाला शुरू हो गयी थी..ये पहला अवसर था जब उसके दिल में स्त्री संवेदना का जन्म हुआ.. उसका हृदय रोने लगा.. वो माँ का समर्पण देख रहा था, वो बहन सुप्रिया का स्नेह देख रहा था ...उसने स्त्री को दादी के रूप में देखा था.. सब अपने थे.. स्त्री से एक नया रिश्ता देखा ..भाभी का रिश्ता ..उसे माँ ने बताया... भाभी भी माँ होती है भाभी माँ..सुधा से ये उसकी दूसरी मुलाकात थी.. उस दिन खाना सुधा ने ही बनाया...
सुदीप ने गुरु के रूप मे माँ को देखा.. माँ उसे पढ़ाती थी..उसे दुनियादारी सिखाती थी..वो माँ के प्रति और भाभी माँ का प्रति श्रद्धामय था.. 
अगले दिन माँ खेत में चली गयी.. भाभी माँ ने घर का काम किया..फुर्सत मिली तो सुदीप से बोली- " सुदीप खाना खाओगे..?"
"हाँ भाभी, बहुत भूख लगी है.."-ये सुदीप का सुधा से भाभी बनने के बाद पहला संवाद था.."
सुधा खाना लगा लायी..सुदीप खाना खाने लगा.सुधा बोली-"सुदीप तुम इतना कम क्यों बोलते हो?"
"भाभी क्या बोलू ... मैंने कुछ देखा ही नहीं.. घर से बाहर जाता ही नहीं... तो कुछ सीखा ही नहीं..माँ कहती है कि जब बात को जानो तब ही बोलो..वर्ना नहीं बोलो..."
"देवर जी तुम बहुत अच्छे हो..."
"पता नहीं ,, मुझे तो सुप्रिया दीदी ही अच्छी लगती है..."
"क्यों भाभी अच्छी नहीं है..?"
"भाभी तो माँ होती है ?"
"ये तुमसे किसने कहा?"
"माँ कहती है "
"अच्छा ,चाची ऐसा बोली थी"
हाँ भाभी, माँ ही मुझे पढ़ाती है वो ही सिखाती है सब कुछ..."
सुदीप सबसे ज्यादा बातें सुप्रिया दीदी से ही करता था.. उसने पहली बार किसी और से इतनी बात की...
“देवर जी आप बहुत सीधे- बहुत भोले हो” –सुधा भाभी ने कहा था..
“पता नहीं भाभी. मैं घर में ही रहता हूँ न..कहीं जाता नहीं ना ..मुझे पता नहीं कैसे बात करते हैं.भाभी मैंने कुछ गलत तो नहीं बोला. ?”
“नहीं देवर जी..आप ने कुछ भी तो गलत नहीं बोला.”
“कुछ गलत बोलूं तो मुझे आप ही डाट देना.. माँ को मत बताना..वर्ना तो डाट पड़ेगी.. माँ बूलेगी-तूने भाभी तो तंग किया.”. 
“अरे, आप ऐसे क्यों बोल रहे हो..मैं चाची को तब बोलूंगी न जब आप मुझे तंग करोगे.”
“मुझे माँ की डाट से बहुत डर लगता है..जानती हो माँ को लगता है घर में मैं ही सबसे ज्यादा शरारती हूँ..नीलू को तो माँ सीधा समझती है.और नीलू तो सब शरारत करता है और फिर माँ के सामने सीधा बन जाता है. हम सबको उसकी वजह से डाट पड़ती है.”
“अच्छा नीलू इतने शरारती हैं. लगते तो बहुत सीधे हैं”.
“भाभी,सब ऐसे ही सोचते हैं..लेकिन वो ही मुझे डाट पड़वाता है..प्रिया दीदी ऐसा नहीं करती.दीदी मुझे बहुत प्यार करती है”.
“ये तो अच्छी बात है.. प्रिया आपको प्यार करती है..करें क्यों न.. आप हो ही इतने प्यारे..”
भाभी ने आगे कहा-“ देवर जी आप बड़ा होकर क्या बनना चाहते हो ?”
“चलूँगा तो बनूँगा ना “-कहकर सुदीप की आँखों में आंसू आ गए.
“दिल छोटा न करो.. आप ठीक हो जाओगे..मेरा मन कहता है”
“पता नहीं .. माँ भी कहती है कि मैं अपने बेटे के लिए इतनी हितया भर रही हूँ ..एक दिन उसे अपने पैरों पर चलते देखना चाहती हूँ..”
“एक दिन चाची के मन की जरुर पूरी होगी..”
उस दिन सुदीप की आँखों में आंसू थे..सुधा ने उन आंसुओं को पोंछने के लिए हाथ बढाया लेकिन कुछ सोचकर हाथ रोक दिए,, 
क्रमशः

Sunday, July 12, 2015

"अधुरा मिलन "
(कहानी )

ये एक पुरानी तन्द्रा थी..पुरे पांच साल पुरानी..लेखन जैसे अवरुद्ध हो गया था..एकदम कुंद ...कोई कथानक नहीं कथा भी नहीं..जैसे किस्सागोई भूल गया था...कारण कुछ भी हो सकता है.. नौकरी की व्यस्तता या फिर वैवाहिक जीवन का सुख..गृहस्थी में रमा बसा लेखक क्या खाक लिख पाता.?.. नव विवाहिता के नाज-ओ-नखरे उसका यौवन उसका चंचला मन ..लेखक को एक अतल गहराई में खींचता गया..मैं अतल गहराई में जाने की कोशिश करता लेकिन हर बार असफल..मिस्टर अग्रवाल अक्सर कहा करते -"मुन्धा घड़ा कभी कोई भर पाया है..इस अतल गहराई को कोई नाप पाया है... या फिर एक निश्चित वलय को पार पाना भी किसी मर्द के बस में नहीं..यहाँ हर तीरंदाज के तीर विफल.स्त्री तू ईश्वर की अजीब रचना तेरी अथाह गहराई जिसे माप पाना भी असंभव और जिससे पार जान भी मुस्किल ....
तंद्रा अभी अभी टूटी है..कहानी का प्लाट मिला था ...लेकिन अभी कुछ भी स्पष्ट नहीं.. मोबाइल की घंटी बजी..एक अजीब सी झुंझलाहट ..जब भी कोई काम करने बैठो..मोबाइल बज उठता है.. काम में व्यवधान..मिस्टर सलूजा सही हैं जो इस चल स्वर यंत्र से दूर ही रहते हैं..
अनमने मन से टेबल से मोबाइल उठा स्क्रीन को देखता हूँ ..ये मिलन की कॉल है .. मिलन की आवाज थोड़ी घबरायी , सहमी है .. 
मिलन में पूछा-"ज्योति प्रसाद जी अभी घर पर कौन कौन है?"
"मिसेज मायके गयी है ..बच्चे अभी पैदा ही नहीं हुए , अमा यार घर पर अकेले हैं "-मैंने जबाब दिया..

"ओह थैंक गॉड...अगर आपको कोई खास काम न हो तो मं आपके पास आना चाहता हूँ..-मिलन ने कहा..

"मिलन जी देख लो शादी नयी नयी है हमारी..और शादी का खुमार अभी उतरा नहीं है..और आप बीवी की अनुपस्थिति में आने का कह रहे हो.".--मैंने ठाहका लगाया..

यार प्रसाद साहब आपको मजाक सूझ रहा है ,,यहाँ जान पर बनी हुई है,, सीरियसली बताइए आप फ्री हैं "-उनका गला भर्रा रहा था..मानो आंसू आने को हों...
"या स्योर ,,कुछ खास काम तो नहीं है,, बस एक कहानी पर काम कर रहा था.."- मैंने थोडा औपचारिक बनने का अभिनय किया ..

"प्रसाद साहब, मैं काफी परेशां हूँ ..प्लीज मेरी मदद कीजिये.."-उनकी आवाज में एक याचना थी.

मैंने उसे आने की स्वीकृति दे दी ...उन्हें रास्ता समझाया और कहा-"आओ तो जनकपुरी के स्टैंड पर उतर कर कॉल कर देना..स्कूटर से लेने आ जाऊंगा.."
वैसे भी मुझा जैसे मसिजीवी के पास कार जैसा साधन तो होता नहीं.. पुराने स्कूटर से ही चलती है जिन्दगी..
अशोक विहार से जनकपुरी तक आने में वक़्त लगता चुनांचे मैंने अस्त व्यस्त कमरा ठीक करना उचित समझा..कमरे के अस्त यास्त होने की भी अपनी महिमा है..मिसेज के मायके जाने से पुरानी महिला मित्र तंग करना शुरू कर देती हैं..तंग करना कहना उचित होगा या हमबिस्तर होना...उनकी अतृप्त इच्छाएं ,कम पिपाषा में डूबी उनकी भावनाएं, और उनका मेरे प्रति दैहिक आकर्षण ..उफ़ कभी कभी सोचता हूँ --एक से ज्यादा स्त्रियों से प्रेम उचित नहीं..फिर ख्याल आया ,,उन नवोदित कवयित्रियों को कैसे निराश किया जाये तो मेरे द्वारा सम्पादित पत्रिका में छपने के लिए प्रेम सुख बिखेरती हैं..
मिलन के आने में अभी समय था..कमरा सही करके किचन में पहुँच गया,,देखा तीन दिन के बर्तन पड़े थे..काम वाली माई भी नहीं आई इन दिनों में ....
दुनिया का सबसे गन्दा काम है झूठन साफ़ करना झूठन किसी की भी हो दुसरो की हो या अपनी..
बहराल लेमन टी का कप मेरे हाथ में था ..सिर्फ उसे ही साफ़ करके एक एक लेमन टी तैयार करके लेखन कक्ष में आ डायरी उठा पुनः कहानी लिखने के लिए कलम उठाया...
कलम साथ नहीं दे पा रही थी.. लेकिन कुछ था जो व्याकुल कर रहा था.. जो कागज पर खुद ब खुद उतर जाने को आतुर था.
मिलन से प्रथम परिचय बी.एड की क्लासेज के समय हुआ था.
सांवला रंग रेशम जैसे कोमल बाल जो उसके ललाट पड़े होते. हवा के झोंके के छू जने से पुनः अपनी जगह आ व्यवस्थित हो जाते..कद ५ फीट ६ इंच ...कुल मिलाकर एक आकर्षक व्यक्तित्व के धनी थे मिस्टर मिलन... वो अशोक बिहार में किराये पर रहते थे..और मैं होस्टल न खुल पाने के कारण करमपुरा पेइंग गेस्ट ...
मिलन के साथ ही आन्दोलन करके होस्टल पर पड़ा ताला खुलवाया था..
यही वजह थी कि मिलन से दोस्ती बढ़ गयी थी और दोस्ती के साथ ही बढ़ गयी थी नजदीकियां...
आज मिलन के आने की खबर ने जहाँ मुझे थोडा विचलित कर दिया था वहीँ पुरानी यादें मन: पटल पर उभर आई...
बी.एड के समय में मिलन साहब और मैं ,मैं यानि ज्योति प्रसाद का सेक्शन अलग था. और बी.एड में इतना ज्यादा बर्डन कि किसी से बात तक करने की फुर्सत नहीं..सिर्फ लाइब्रेरी में ही मुलाकात होती थी..या फिर अगर थक जाओ तो कैंटीन में चाय पीते हुए ....
मिलन के अध्ययन से लगता था कि लम्बी रेस का घोडा है..
बी.एड के एग्जाम के बाद मिलन और मैं कैंटीन में बैठे चाय का आनंद ले रहे थे..
"तो मिलन साहब अब क्या करने का इरादा है ?"

ऐसा है प्रसाद साहब , मैं तो एम्.एड में प्रवेश की सोच रहा हूँ.आपका क्या इरादा है"
एम्.एड में फॉर्म तो डालूँगा लेकिन सीट्स कम हैं ..और फिर फिसर डिपार्टमेंट के ही छात्र तो आते नहीं एंट्रेंस एग्जाम में आल इंडिया से आते है.. दाखिला मिला तो एक साल और छुट्टिया बढ़वा लेंगे..नाही तो जाकर अपनी पुरानी नौकरी ज्वाइन कर लेंगे.."
"हाँ प्रसाद साहब आपको नौकरी की तो चिंता ही नहीं..पिताजी का अच्छा खासा कारोबार और गॉव में खूब खेती बाड़ी.. मज़े से जिन्दगी जियोगे..इकलौते वैसे हो.."

" नहीं भाई मैं पिताजी की विरासत पर ऐश नहीं करना चाहता..वर्ना तो उनको आसामियां ही इतनी हैं कि ब्याज के पैसे से ही गुजारा हो जाये..लेकिन मैं कुछ खुद का करना चाहता था.. तभी तो पढने की लाइन पर चला. क्लर्की छोड़कर बी.एड करने आया.."

उस दिन हम दोनों ने निर्णय लिया कि एम्.एड के लिए तैयारी करेंगे..और फिर हमने लाइब्रेरी में बैठने की अवधि बढा दी.. 
इसी बीच बी.एड के नए सत्र के फॉर्म निकले..सुबह सुबह का वक़्त था..मैं चाय पीने कैंटीन में जा रहा था ..कैंटीन लोन के सामने के पेड़ के नीचे मिलन साहब किसी लड़की के साथ खड़े थे.मैं तीन चाय का आर्डर करके उनके पास आया.. 
मिलन ने परिचय कराया.."प्रसाद साहब अपनी भाभी से मिलो.."
"भाभी ?"--मेर मुँह विषमय से खुला..लेकिन शब्द अन्दर ही रह गए.. चाय आ गयी थी..मिलन ने बताया कि इनकी इच्छा बी.एड करने की है..इसलिए फॉर्म भरने आई है..उन्होंने पहले कभी शादी का जिक्र तक नहीं किया था इसलिए मेरे लिए ये आश्चर्यजनक बात थी.. हालाकि किसी का शादी सुदा होना या न होना कोई ज्यादा मायने नहीं रखता..

चाय पीते हुए मिलन ने मुझे साइड में चलने का इशारा किया..मैं चाय का कप हाथ में लिए उनके साथ दस कदम साइड में आ गया..
उसने कहा-"प्रसाद साहब आप मेरे मित्र है आपसे एक गुजारिश है "
"जी बोलिए "

"आप ये बात किसी से शेयर नहीं करेंगे कि मैं शादी सुदा हूँ और पत्नी को फॉर्म भरने लाया था."

"ठीक है मिलन साहब मुझे क्या पड़ी है जो....."

चाय पीकर मैं लाइब्रेरी आ गया लेकिन ये बात मेरे दिमाग को कोंध्ती रही.. क्यों लोग शादी को रहस्यमयी बना देने को उतारू रहते हैं..आखिर ऐसा क्या है जो वो शादी जैसे विषय को छुपा कर रखना चाहते हैं...
एम्.एड. की प्रवेश परीक्षा का परिणाम आ चुका था. अपने ग्रुप से ५ एडमिशन थे. बाकि सब बाहर से.. उमेश, बिजेंद्र नीलम नीता से एंट्रेंस के समय ही परिचय हो गया था..
एम्.एड की फीस जमा की तो सब लोग कैंटीन आ आगे.. हंसी विनोद का दौर चल पड़ा. उमेश काफी दिलचस्प और मजाकिया लड़का था. हम लोग एक टेबल के साथ बैठे चाय का इंतज़ार कर रहे थे.. उमेश ने कहा-आज ही सब तय कर लो..कौन किसकी गर्ल फ्रेंड होगी..बाद में कोई किसी के घर में डांका नही डालेगा.
अरे उमेश एम्.एड. तक आते आते सबके कपल्स बने होते हैं कोई चांस नहीं...”-मैंने कहा था.

अरे ज्योति भाई आप भी ना..दिल्ली में कोई कभी अंगेज नहीं होता..आप ट्राई तो करो..कब किसका किसपे सिप्पा चल जाये..इसका कोई भरोसा नहीं..

ठीक हैं भाई चुन लो”-मैंने प्रतिउत्तर में कहा.. जैसे ये कोई चुनाव प्रतियोगिता हो..और चुनने में आपको खुली छूट हो..

उमेश ने नीमल की ओर इशारा करके कहा..ये तुम सबकी भाभी है. इसे कोई गलत नजर से नहीं देखेगा.सबने सहमती जाता दी.. अब बरी बिजेंद्र की थी..उसने नीता से नजरे मिलाने की कोशिश की.. नीता अपनी सहेलियों के साथ व्यस्त थी.. बिना बोले सब समझ गए कि बिजेंद्र की मंशा क्या है..उमेश ने मुझसे पूछा—“ज्योति भाई . आप भी कुछ बताये. कौन खुशनसीब है जो भाई की भाभी बनेगी..उसका इतना कहना था कि एक जोर का ठहाका लगा..अरे..भाई की भाभी तो नीलम बन गयी अब तो भाई वाली भाभी चुननी है..
मैंने कहा-सच कहूँ तो इस बैच में जितनी लड़कियों से पहचान हुई है उनमे किसी का स्तर मुझे नहीं लगा जो प्रेमिका बन सके..और फिर ये सब चुनने का नहीं महसूस करने का मामला है.. हो सकता है कोई आये जिसे देख अपना भी दिल आहे भरने लगे..
कही अपने बी.एड. से तो नहीं..”-बिजेंद्र ने कहा..

नॉ चांस ..मिस्टर .. ज्योति प्रसाद की माशूका बनने के लिए तो बहुत कुछ चाहिए..”-मैंने मामला हल्का किया..

अब बारी मिलन साहब की थी..उमेश ने छेड़ा-मिलन जी कहिये .. किस पर नजरें इनायत है..
अरे भाई जिस पर नजरे इनायत हो सकती थी उसका वरन तो आपने कर लिया है..लगता है अपने भाग्य में तो ज्योति साहब की तरह इंतज़ार करना ही लिखा है..

इस तरह ग्रुप में हंसी मजाक चलने लगा..क्लासेज शुरू हुई तो सब पढाई में रमने लगे.मिसेज माथुर दर्शनशास्त्र पढ़ाती. कुछ समझ न आता तो डायरी में कविता लिखन लगा .एक दिन क्लास चल रही थी..दकार्ते के दार्शनिक विचार पर चर्चा चल रही थी..कमरे केबाहर से आवाज आई ..एक्सक्युज मी.. मैडम ..मय आई कम इन ...
सबकी नजरे गेट की तरह ... कोले बाल कंधो पर बिखरे हुए ...बालो के ऊपर चश्मा.. आकर्षक चेहरा...एक बारगी लगा सिलसिला फिल्म की रेखाजी खड़ी हैं.. मैडम की परमिशन से वो लड़की अन्दर आई. मैडम ने परिचय पूछा ..उसने कहा-जी मेरा नाम रीतू है..उदयपुर से हूँ..कल ही एडमिशन लिया है.. एक्चुअली मेरा एडमिशन वेटिंग से हुआ है..
रीतू को देखकर लगा कि लगता है अपनी तो तलाश अब ख़त्म हुई..ये ही तो है जिसकी तलाश थी. क्लास ख़त्म हुई तो सब चाय के लिए कैंटीन की तरफ दौड़े.. मैं में एक उमंग का संचार हुआ..मैं इसी संचार के साथ कैंटीन की ओर दौड़ा..
रितु अवस्थी का रूप लावण्य ऐसा कि कोई भी उसपर मोहित हो सकता था..मेरे दिल की धड़कन उसे देख बढ़ जाती...
रेखा जी मेरी पसंदीदा अभिनेत्री थी.. और उनसे मिलती जुलती शख्सियत मुझे कुछ बेचैन करने लगी...कैंटीन की तरफ जैसे ही मैं पहुंचा रितु अवस्थी से टक्कर हो गयी..
"सो सॉरी मिस अवस्थी"-मैंने कहा..

"इट्स ओके,, ज्योति प्रसाद जी.."

"आप भी लगता है कैंटीन ही आ रही थी..?"--मैंने बात करने की गरज से बोला..

जी, असल में मैं आज लंच नहीं लायी.. असल में सुबह लंच बना ही नहीं , माँम की तबियत सही नहीं थी और सुबह तो टाइम ही नहीं होता कि खुद बना सकें..आप तो होस्टल में रहते हैं ,,आपको तो बना बनाया मिल जाता है.."-उधर से जबाब आया..
"जी चलिए ,, कैंटीन चलते हैं वही बैठकर बात करते हैं..साथ में खाना पीना भी हो जायेगा..-मैंने आग्रह पूर्वक कहा.मैं हैरान था कि उन्हें दो ही दिन हुए और मेरा होस्टलर होने का भी ज्ञान है..

अब हम दोनों कैंटीन की एक टेबल पर आमने सामने बैठे थे..
"मिस अवस्थी.. जानते हो मुझे आपमें रेखाजी का अक्स दिखाई देता है.. लगता है जैसे सिलसिला फिल्म की नायिका मेरे सामने बैठी है.."

"आप मुझ पर लाइन तो नहीं मार रहे मिस्टर"--उसने कहा..

मेरा चेहरा झेप सा गया.मुझसे कोई जबाब ना बन पड़ा.मेरी नजरे शंका और श्रम से नीचे झुक गयी..एक ठहाका गूंजा तो मैं आश्चर्य में पड पाया. "क्यों ज्योति प्रसाद जी ,,लगा न झटका?--वो हँस रही थी..
"आप शायद गलत सोच रही हैं..मैं पहली मुलाकत में किसी के बारे में राय नहीं बनाता.."-मैंने झेपते हुए उत्तर दिया..

समोसे और चाय के दो कप आ चुके थे.. उसने कहा.. "कैंटीन बॉय को आर्डर दिए बिना ये सब कैसे आ गया.. और मैं तो चाय नहीं पीती हाँ कोल्ड ड्रिंक जरुर पीती हूँ.".
राजू कंटीन बॉय इशारा समझ एक चाय उठा ले गया और एक बोतल कोल्ड ड्रिंक की रख गया.
"अच्छा आपको अपना नाम अजीब सा नहीं लगता..ज्योति....प्रसाद... जी "

असल में मेरा नाम ज्योति प्रसाद है जी तो आप एक्स्ट्रा लगा रही हैं..वैसे लोग मुझे जे.पी. कहते हैं आप भी ऐसा कह सकती है.." 
"जेपी मतलब क्रांति... "

"जी आप ऐसा मान सकती हैं..."

"तब तो आप बड़े दिलचस्प हैं.. आपसे दोस्ती करनी पड़ेगी.."

ऐसा सुनकर दिल की धड़कन थोड़ी बढ़ गयी लेकिन सांसो को संयत करने का अभिनय किया..शायद उस एभि ये आभास हो गया कि मेरी सांसे उखड रही हैं..
"क्या हुआ जेपी साहब ? कहाँ खो गए? "

"नहीं ..कंही नहीं खोया.. सोच रहा था कि उदयपुर की बाला भी कम दिलचस्प नहीं है.."

तो फिर बढाइये हाथ आज से दोस्ती पक्की...
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कमरे की अस्त-व्यस्तता को देखकर एक बारगी गुस्सा आया फिर सामान एडजस्ट कर लेखन कक्ष में आ चाय का कप ख़त्म कर विल्स का पैकेट निकाल सिगरेट सुलगाई.. और छल्ले छोड़ने लगा..ये स्थिति अक्सर तनाव के क्षणों में होती है..
मिस अवस्थी का चेहरा मेरी आँखों के सामने आ गया था..एक घर्णित सा भाव मेरे मन में आया.. डायरी निकाल मैं कुछ लिखने का प्रयास करने लगा.. 
मिस अवस्थी की शोख चंचल हंसी सबको उसका कायल कर देती थी...उस दिन कंटीन से निकल हम क्लास करने गए तो मैं उसे कनखियों से देखता रहा..कुछ सपने कुछ अरमान पल भर में मेरे मन में पनपने लगे..क्लास ख़त्म हुई तो उसने कहा था--"जेपी बाइक से मुझे स्टैंड तक छोड़ दोगे"
होस्टल में रहते हुए भी मैं बाइक रखता था... जेब खर्च के लिए पिताजी पर आश्रित न होकर ट्यूशन पढाता था तो बाइक मेरी जरुरत बन गयी थी...
मैंने कहा --ठीक है मिस अवस्थी ..छोड़ आते हैं ..मैंने बाइक निकाली..वो पीछे बैठ गयी.. स्पीड पकड़ते ही उसने अपना हाथ पेट की और लाकर कसके पकड़ लिया..एक सुखद अनुभूति का अहसास हुआ ... बाइक ने स्पीड पकड़ी तो उसकी कॉलोनी तक ही जाकर रुकी.. उसने अन्दर आने का आग्रह किया ..तो मैंने अनभिज्ञता जाहिर की और एक सुखद बाय के साथ बाइक को वापिस मोड़ लिया..
दो महीने के सुखद मेल मिलाप के बाद यकायक उसका मुझसे दूरी बनाना समझ नहीं पाया... 
श्रुति ने एक बार बताया कि आपका दोस्त मिलन और आपकी मिस अवस्थी में कुछ पाक रहा है..मैंने उस बात पर ज्यादा गौर नहीं किया..लेकिन कैंटीन लाइब्रेरी और क्लास के बाद दोनों का अक्सर स्टैंड तक साथ जाना देखकर ये तय हो गया था कि कुछ ज्यादा ही पाक रहा था..
श्रुति ने मुझसे कहा था कि जेपी आप रितु को बता क्यों नहीं देते कि मिलन शादी सुदा है ..वो उसकी जिन्दगी क साथ मजाक कर रहा है...मैंने उससे कहा था--"श्रुति तुम्हे ऐसा लगता है कि मैं उसे बोलूँगा और वो विश्वास कर लेगी..और मिलम मेरा दोस्त है वो क्या सोचेगा ? एक लड़की के लिए मैं क्या अपने दोस्त की दोस्ती ख़त्म कर दूँ ..नहीं श्रुति..मैं ऐसा नहीं कर सकता.."श्रुति ने मुझे बहुत कन्विंस करने की कोशिश की कि मैं उसे सच बताऊँ ....
हम लोग कैंटीन में बैठे थे.. माहौल गानों का था..मिस अवस्थी ने गाना सुनाया -- सांसो में चले आयो ..हमसे सनम क्या पर्दा...अब बारी मेरी थी.मैंने गाना शुरू किया...अहसान तेरा होगा मुझ पर ..मिलन ने अपनी बारी आने पर सुनाया--चन्दन सा बदन चंचल चितवन..ये धीरे से तेरा मुस्काना .
...ये सब सिलसिला चल ही रहा था कि मिलन की क्लास का टाइम हो गया..वो क्लास करने गया तो श्रुति ने मुझे इशारा किया..मैंने कहा -" मिस अवस्थी आपसे कुछ बताना था..."

" जी ...कहिये "

"आप जानती हैं मिलन साहब शादीसुदा हैं ?"

"मैं आपका मतलब नहीं समझी..."

इस बीच श्रुति और अन्य दोस्त भी सलीके से वहां से खिसक गए थे...
"देखो तुम मेरी अच्छी दोस्त हो..मैं नहीं चाहता कि तुम किसी गलत फहमी का शिकार रहो..मिलन एक शादीसुदा लड़का है और तुम उससके साथ जितना आगे जाओगी उतना ही दुखी रहोगी..मेरा फर्ज था तुम्हे बताना..आगे तुम्हारी मर्जी.."

उसका चेहरा रुआसा हो गया.. वो एक भी शब्द बोले बिना कैंटीन से चली ...
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मिलन का फोन आया तो मैं अवचेंतन से बाहर आया.. मैंने मिलन को कहा कि तुम स्टैंड पर मेरा इंतज़ार करो..मैं ५ मिनट में पहुंचता हूँ...
स्कूटर बाहर निकाल किक लगायी ...और मिलन को लेने निकल पड़ा..याद आया वो पल जब एक दिन बाइक पर मिस अवस्थी बैठी थी.. बाइक हवा में बाते कर रही थी..उसने कसकर मुझे पकड़ा हुआ था..बिलकुल वही अंदाज जो रेखाजी के साथ सपने में घुमने का होता था..मालूम ही नहीं हुआ कि जिन्दगी बेवफा भी हो सकती है.. मिस अवस्थी ने बोंटा पार्क देखकर बाइक रोकने की पेशकश की/.. मैंने बाइक साइड में लगा दी.. और हम एक गेट से बोंटा में प्रवेश कर गए..थोड़ी देर टहलते रहे..वो पक्षियों के झुण्ड देखती तो उन्हें हाथ से उड़ा देती,,मैं कहता --" रितु क्यों इन प्रेमातुर पंछियों को तंग करती हो..मन में गाली देते होंगे.. ये पाप है.. क्या ये हमें तंग कर रहे हैं जो हम इन्हें तंग करे.."
अरे वाह बड़े प्रकृति प्रेमी हो.. आपका ये अंदाज जो हमने जाना भी नहीं था..और क्या क्या अंदाज हैं जेपी साहब के?"
"मैं तो प्रेम का रंग ही जानता हूँ ..मिस ...अवस्थी..मैंने छेड़ने के अंदाज में कहा था.."

घूमते घूमते हम दोनों एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगे थे..पास के झुरमुटों से फुसफुसाने की आवाज आ रही थी..मिस अवस्थी का ध्यान उस तरफ गया.. तो उसने पूछा जेपी ये प्रेमी जोड़े क्या बात करते हैं..?" 
मैंने कहा था --"बात क्या करना ? बात तो खुले मैदान में भी होती है यूँ झाड़ियों के पीछे जाकर सिर्फ बाते ही होती है ? खुद समझ सकती हो क्या कुछ होता होगा वहा?"
"आपको बहुत कुछ मालूम है यहाँ के बारे में ?"

"डिअर, ये तुम्हारा उदयपुर नहीं दिल्ली है.. यहाँ प्रेम के निराले अंदाज है.."-मैंने चुटकी काटी थी..

"अच्छा अगर मैं आपको उधर चलने के लिए कहूँ ? आपका क्या रिएक्शन होगा..??"

"मैं साफ़ मना कर दूंगा.."

"ऐसा क्या ? विश्वामित्र हो? बड़े बड़े ऋषियों का ताप भंग किया हम उर्वशी रम्भाओं ने जनाब ..आप तो किस खेत का बथुआ हैं..."

"चलो वक़्त आने पर पता चलेगा.."

आज स्कूटर चलते हुए वो अंतिम एकांत मुलाकात याद आई तो इमाग झन्ना गया.. स्टैंड आ चूका था ..मिलन खड़े हुए इंतज़ार कर रहा था.. औपचारिकता वश हाथ मिलाया और उन्हें बैठा घर आ गया..
रास्ते में औपचारिक बाते ही हुई..घर आकर हम अन्दर दाखिल हुए,, मैंने स्टडी में बैठना जयादा वाजिब समझा..इतेफाकन मेड भी आ चुकी थी... मेड ने ही पानी लाकर दिया..मैंने उसे लेमन टी के लिए बोला और मैं मिलन साहब से बातों में मशगूल हो गया..
मैंने ही बातो का सिलसिला शुरू किया -"मिलन साहब बताइए क्या हुआ? क्यों इतने दुखी हो ?"
"बताता हूँ..समझ नहीं पा रहा किन शब्दों से शुरू करूँ ?"

"यार जिनके दोनों हाथ में लड्डू हों ,,उनकी जिन्दगी में कौन सी मुसीबत आ सकती है..?"

"ज्योति प्रसाद जी ..मैं वाकई बहुत परेशान हूँ ऐसी बाते बोलकर आप मुझे शर्मिंदा न करें.."

"अरे भाई मैं शर्मिंदा कहाँ कर रहा हूँ ? मैं तो हैरान हूँ कि आप इतने लम्बे समय तक दो दो को कैसे संभाल रहे हैं.."

मेरे कटाक्ष से शायद मिलन साहब अन्दर तक आहत हुए बिन नहीं रहे..शायद उनकी आत्मा तक चोट लगी.. उन्होंने कहा-"आप सुनोगे तो मेरी हालत पर तरस आएगा.."
"ठीक है सुनाइए"-मैंने उत्सुकता दिखाने का प्रयास किया..

उन्होंने कहना शुरू किया ---"एम्.एड करने के बाद मेरी जॉब टी.जी.टी. समाज विज्ञान लगी तो रितु से मिलना जुलना बंद हो गया. हालाकि वो रिसर्च कर रही थी मुलाकात हो जाती थी..फोन पर ही जयादा बातचीत होती थी..लेकिन मिलना जुलना न के बराबर था..मैं मिलने को उत्सुक रहता था ..लेकन समय ही ऐसा था कि चाहकर भी मुलाकात न हो पाती थी..."
"अच्छा..मिलन साहब इस सब के बारे में भाभी को अंदेशा नहीं है.."

"है न तभी तो आपके पास आना पड़ा...रितु के प्रेंम भरे मसेज मोबाइल में थे जिन्हें मैंने स्नेहवश डिलीट नहीं किए वो मेरी पत्नी आकृति ने पढ़ लिए तो घर में हंगामा होना शुरू..अकसर झगडे होते..पत्नी बेवकूफ एक नंबर की..बी.एड में एडमिशन नहीं हो पाया और खुद को अप्लातून समझती है.चोरी छिपे मेरे मोबाइल को चेक करती है...खून पी रही है मेरा.. मन करता है गला दबा दूँ.."

उफ़ किसी इंसान के दिल में पत्नी के लिए इतनी नफरत ...मैंने सोचा.. मुझे मिलन पर गुस्सा भी आया और तरस भी..मन किया कि कह दूँ कि ये सब के तुम खुद जिम्मेदार हो.. लेकिन कह नहीं पाया ..अभी उनका मेरे पास आने का मकसद भी जानना था..मैंने उसे मायूस करना ठीक नहीं समझा ...मैने कहा--" ऐसा मत सोचो.पत्नी के बारे में ऐसा सोचना उचित नहीं.."
"आप ठीक कहते हैं ज्योति प्रसाद जी..पत्नी के बारे में बुरा नहीं सोचना चाहिए..लेकिन पत्नी भी तो पति को कुछ समझे..जो पति को खाना भी बनाकर न दे वो क्या पत्नी..?"

"बुरा मत मानना मिलन बाबु ..लेकिन सोचो अगर पत्नी को उसका दर्जा न मिले ..उसे पता चले कि पति की जिन्दगी में उसके अलावा कोई और भी है या कोई और ही है तो वो भी क्यों पति के साथ तन मन से साथ होने का स्वांग करे ? इससे अच्छा तो मैं उसका रिवोल्ट करना सही मानता हूँ..हो सकता है आप मेरी बात से इत्तेफाक न रखते हों.. लेकिन ये ट्रू है.."

"सच तो और भी बहुत हैं..लेकिन ये भी तो सच है कि पत्नी के तनाव देने के चलते ही पति उस प्यार को बाहर खोजता है..क्या मैं प्यार का फल नहीं चखना चाहता था.. अगर मुझे प्यार घर में मिला होता तो क्यों मैं वो प्यार बाहर खोजता..?"

मुझे मिलन के तर्क में कोई दम नहीं लगा..लेकिन मेरी इस बात में ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी..बस औपचारिकता वश सुन रहा था.. मुझे लगा कैसे पुरुष समाज अपने फायदे के लिए तर्क घड लेता है..खुद को सही साबित करने के लिए हजार बाते कहेगा..वाह रे कामातुर मन..तेरा भी हद हाल है..
"लेखक महोदय आप ठहरे नारीवादी लेखक ..आपको मेरी समस्या में बहुत सी खामिया दिख जाएगी..लेकिन कभी हम मर्दों के नजरिये से भी देखा कीजिये..मैंने अपनी गृहस्थी ज़माने के बहुत प्रयास किये लेकिन सब असफल.आकृति को कुछ नहीं सूझता.. उसे बस झगड़ने के बहाने चाहिए.. "

"ठीक हैं मिलन साहब समस्या आपकी है आप जायदा जानते होंगे ..आप ये बताइए मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ"...--चाय में देरी के कारन मेरा दिमाग थोडा सा भन्नाया हुआ था..

चाय आई तो मैं मिलन को एक कप पकड़ा .और दूसरा अपने हाथ में पकड़ उन्हें सुनने के लिए इत्मिमान से पैर फैला बैठ गया...
" मेरी पत्नी मुझ पर शक करती है...वो रितु के मेरे बीच में बड़ी बाधा है ..वो नहीं चाहती कि हम कभी मिलें..उसका बस चले तो हमदोनों को मौत के घाट उतार दे.."

मन किया कि बोल दूँ कि एक दिन आप भी मेरे और मिस अवस्थी के बीच बाधा बने थे.. मेरे प्रेम को पींगे बढ़ने से पहले ही कुचल दिया गया था..जबकि आपक पास खुद की पत्नी थी और मेरे पास सपनो के सिवा कुछ भी नहीं.. पाश का कहना है कि सबसे खतरनाक होता है सपनो का मर जाना ,,लेकिन मेरे सपने तो इन दोनों ने ही मार दिए थे.. सपनो की भ्रूण हत्या कर दी गयी थी...
गाज़ियाबाद में एक बी.एड. कॉलेज खुला था..परमेश सर वहा डायरेक्टर थे.. मिलन और मैं दोनों ही प्रो. परमेश के स्नेह का पात्र थे.. एक दिन मेरे पास प्रो.साहब का फोन आया कि गाजियाबाद अपने डोक्युमेन्ट्स लेकर कल आ जाओ..मैंने बिना कोई सवाल किये हामी भर दी और निश्चित समय पर वहाँ पहुँच गया था..
जाने पर पता चला कि आज कॉलेज में सिलेक्शन के लिए इंटरव्यू है.. मिलन और मिस अवस्थी दोनों आये हुए थे.. इंटरव्यू में बहुत से सवाल दर्शनशास्त्र पर पूछे गए.. एक दो सवालों को चुद अमूमन सब सवाल के जबाब सही दिए.. 
बाद में पता चला कि हम तीनो का ही सिलेक्शन हो गया था.. मिस अवस्थी ने बेरोजगारी के चलते रिसर्च छोड़ वहां ज्वाइन कर लिया था..मिलन साहब ने भी सरकारी नौकरी छोड़ जाने का निर्णय लिया..लेकिन मैं सरकारी नौकरी का लालच नहीं त्याग पाया ...दोनों जगह ४ हज़ार सैलरी का अंतर था.. छठे वेतन आयोग का इंतज़ार था.. चुनांचे मैंने अपने विभाग में रहने का ही निर्णय लिया..और अस्सिस्टेंट प्रोफेसर बनने के सपने को त्याग दिया..
बी.एड. कॉलेज में दोनों का इश्क और परवान चढ़ा..
डॉ.अलका भी उसी विभाग में नौकरी कर रही थी...जिनकी मार्फ़त मुझे वहां का हाल मालूम होता रहता .... जब इश्क और परवान चढ़ा तो प्रो.परमेश को अखरने लगा..उन्होंने मिलन को चेताया.. इश्क में लोग हद से गुजर जाते है कहावत को चरितार्थ करते हुए मिलन ने प्रो. साहब के खिलाफ साजिश रचनी शुरू की ..प्रबंधको को प्रो.साहब के खिलाफ भड़काना शुरू किया और एक दिन उनके ऊपर धन सम्बन्धी धांधलियों का आरोप लगवाकर खुद हेड की कुर्सी पर कब्ज़ा कर लिया... मिलन साहब की इस कारगुजारी से प्रो.परमेश इतन आहात हुए कि उन्हें दिल की बीमारी ने आ घेरा.. मैं डॉ. अलका के कहने पर इस्पुरी दृश्य में मूक ही रहा.. 
मिलन ने अपनी बात जारी रखते हुए कहा---" ज्योति प्रसाद जी.. मैं अब पत्नी के साथ और जायदा रहना नहीं चाहता..आप तो आजकल पुलिश राजनीती अदालत सबमे जान-पहचान बनाये हुए हो..किसी अच्छे वकील से बातचीत करिए.. और मुझे पत्नी से छुटकारा दिलाइये.."
मैंने उन्हें समझाया -- देखो मिलन साहब .. आपके एक बेटा भी है.. तलाक का केस लम्बा चलेगा ..बच्चे की कस्टडी का भी सवाल आएगा.. और आपको क्या ऐसा लगता है कि आपके तलाक लेने के बाद मिस अवस्थी आपसे शादी करेगी.. और वो आपके बच्चे की परवरिश करेगी..वकील तो मैं कल ही बुला दूंगा...लेकिन सोच लो..."
" अभी मैंने इतना सब नहीं सोचा लेकिन मुझे एक बार रितु से बात करनी होगी.. वो शादी करती है या नहीं ..ये ज्यादा बड़ी बात नहीं..लेकिन पत्नी के साथ नहीं रहना.."

"ऐसा क्या हुआ जो इतना बड़ा निर्णय लेने जा रहे हो..शादी कोई मजाक नहीं और तलाक भी..हमें बहुत बारीकी से सोचना होगा.."

" आज सुबह ही बड़ा हंगामा हुआ ..मरने मरने जैसी नौबत आ गयी थी..आज मैंने घर छोड़ने का निर्णय लिया ..सोचा कहाँ जाऊ? फिर आपका खेल आया.."

देखो मिलन साहब ,, मैं आपको कितने दिन रख सकता हूँ..जब तक मेरी पत्नी यहाँ नहीं है..जिस दिन वो आ जाएगी.. मैं आपको एक दिन भी नहीं रख पाउँगा.. मैंने और पत्नी ने मिलकर ये उसूल बनायें हैं.."
"कोई बात नहीं .. मैं तक कुछ और व्यवस्था कर लूँगा.."

"अच्छा मिलन जी ...अगर मैं कुछ मध्यस्थता करूँ ..आपके जीवन की गाड़ी पटरी प् आ जाए.."

" नहीं ..अब मुझे कोई समझौता नहीं करना...आप बस किसी वकील से बात कीजिये.."

"क्या ये आपका अंतिम निर्णय है ?"

"जी ,,मरना मंजूर है लेकिन अपनी बेवकूफ पत्नी के साथ अब एक पल नहीं रहना.."

मेरी मेड ने आकर बताया कि खाना तैयार है साहब आप लोग खाना खा लें और साहब आपका आराम करने का भी समय हो गया.. खाना भी आधा घंटा लेट है..मैंने उसे डांटा कि जब किसी से बात कर रहा होता हूँ तो ज्यादा बक बक मत किया करो..वो शर्मिंदा होकर चली गयी..खाना डाइनिंग टेबल पर लग चूका था..मैं मिलन को लाकर डाइनिंग होल में गया..

मिलन ने डाईनिंग टेबल के पास आकार एक कुर्सी बाहर की ओर खिंची..और उस पर बैठ गया..सामने वाली कुर्सी पर मैं बैठ गया..मेड ने दोनों के लिए प्लेट रखी..और खाना सर्व किया.. दही में बनाया लजीज मटन साथ में चपाती, मिंट की चटनी, लेमन राइस और दाल परोस मेड प्रफुल्लित थी.. श्रीमती के मायके जाने के बाद मेड का घर में जैसे पूरा राज हो जाता. जो चीजे श्रीमती जी कलेस्ट्रोल बढ़ने के डर से नहीं खाने देती.. मेड वो सब बड़े चाव से खिला देती है.. और उसे बदले में बखसीस भी मिल जाती है.. दिल पर राज़ करने वाली मेड मिलती भी कितनी हैं.. रीटा का खाना बनाने में जबाब नहीं.. श्रीमती जी तो पुरे महीने का बजट देखती हैं लेकिन रीटा को तो साहब को खुश देखना अच्छा लगता है.. डाईनिंग रूम हो या बाथरूम या फिर बेडरूम उसकी सेवा का जबाब नहीं...
अभी कुछ दिन पहले ही रीटा अमृतसर गयी तो एक कड़ा लेकर आई..श्रीमती से छिपाकर दिया तो बोली--" साहब आप तो बहुत कुछ देते है.. एक छोटा सा गिफ्ट मेरी तरफ से रख लीजिये.. "
उसके आग्रह पर जिंदगी में पहली बार कड़ा पहना.. जिस पर पंजाबी में कुछ लिखा था.. जब से वो विधवा हुई है तब से ही मेड का काम करने लगी है.. अच्छी खासी गृहस्थी पल भर में बिखर गयी थी.. एक बेटा स्कूल में पढ़ रहा था.. उसकी पढाई का खर्च वगैरह कैसे वहन करे.. रीटा की मदद करके मेरे मन को असीम सुख मिलता...
मिलन साहब खाने में दिलचस्पी नहीं ले रहे थे. मैंने उनसे पूछा -" मिलन बाबु खाना पसंद नहीं आया क्या ?"
"खाना एक दम स्वादिष्ट है ज्योति प्रसाद जी..बस दिमाग में ही उलझन है..."

उलझन को दूर करने के लिए मैंने एडवोकेट चौधरी को फोन करके शाम की चाय पर आने का बोल दिया..
खाना खाने के बाद मेड मिलन को रेस्ट रूम ले गयी.. और मैं स्टडी में आकर दिवाननुमा चौकी पर लेट गया..और सुस्ताने लगा.. जब आंख खुली तो साढ़े चार बजे थे.. वाशबेसिन पर जाकर मुँह धोया ...एडवोकेट चौधरी आये तो रीटा चाय बना लायी..तीनो के हाथ में चाय के कप थे.. परिचय के बाद मैंने कहा -" चौधरी ! मेरे मित्र अपनी पत्नी के साथ नहीं रहना चाहते. इन्हें तलाक़ दिला दीजिये..."
एडवोकेट चौधरी हँसे--" जे.पी. साहब वकील के पास कोई जादुई छड़ी नहीं होती..पहले फैक्ट्स को समझना होगा..स्टोरी को समझना होगा.."
अब मिलन साहब ने उन्हें सारा किस्सा सुनाया..लेकिन रितु वाला पोर्सन छिपा लिया.. चौधरी ने मामले को अपने तरीके से समझने के बाद उन्हें सारी बातें लिखकर देने को कहा ताकि एक नोटिस तैयार किया जा सके..
मिलन ने अपनी शंका जाहिर की -" वकील साहब इस पूरे केस में आपकी फीस क्या होगी.. ?"
"देखिये आप जे.पी के दोस्त है.. इस लिहाज से मैं आपके ४० हज़ार एक केस की फीस लूँगा वैसे मेरा रेट ६० हज़ार है..."

मिलन ने उन्हें एक बार फिर मिलने का कहा... चौधरी साहब चले गए..मिलन को फीस ज्यादा लग रही थी.. चौधरी ने जाने से पहले अपना कार्ड मिलन को थमा दिया था.
४ -५ दिन मेरे पास रहने के बाद मिलन साहब वापिस चले गए..
उन्हें गए हफ्ता गुजरा होगा, मेरे फोन पर अनजान नंबर से कॉल आई.. मैं अमूमन अनजान नंबर कम ही उठाता हूँ...फोन उठाया तो किसी बुजुर्ग की आवाज थी.बोले- "ज्योति प्रसाद जी मैं मिलन का ससुर बोल रहा हूँ..मिलन ने मेरी बेटी की जिन्दगी तवाह करके रख दी है.. रितु की वजह से वो मेरी बेटी को तंग करता है.."
मैंने उत्सुकता का अभिनय करते हुए पूछा-"कौन रितु?"
"कमाल करते है आप भी इतने क्लोज फ्रेंड होकर रितु को नहीं जानते..ठीक है मैं बताता हूँ...वो रितु जो आपके साथ एम्.एड में पढ़ती थी..."

" देखिये श्रीमान जी हर साथ पढने वाला दोस्त नहीं होता..ठीक वैसे ही जैसे हर जान -पहचान वाला दोस्त नहीं होता .. ठीक है मैंने इन लोगो के साथ एम्.एड. किया लेकिन मेरा इनसे कोई खास संपर्क नहीं रहा.. मैं स्कूल टीचिंग में आ गया और ये लोग कॉलेज में चले गए..लेकिन मुझे समझ नहीं आया कि आपने मुझे फोन क्यों किया?"

देखिये सर आप मिलन के दोस्त हैं इस लिहाज से मैंने आपको फोन किया..उसे समझाईये वो जो खेल खेल रहा है..उसमे वो बर्बाद हो जायेगा.. मेरी बेटी का जो होगा वो तो होगा लेकिन मैं उसे बर्बाद कर दूंगा.."
"श्रीमान जी मिलन आपका दामाद है आप जो भी करें.मैं आपकी चाहकर भी कोई मदद नहीं कर सकता.. मेरी संवेदना आपकी बेटी के साथ है..लेकिन अच्छा हो कि वो दोनों इस मसले पर बात करे.. संवाद से बहुत कुछ हल हो जाता है.."

"अगर मिलन को हल करना होता तो वो वकीलों से सलाह न लेता...आप उसे समझा देना कि आग से ना खेले जल जायेगा .."

उनके फ़िल्मी डायलोग सुनकर मैंने फोन रख दिया.. एक बेटी के बाप का दर्द मुझे वेदना दे रहा था..साथ ही ये भी रहस्य था कि इन्हें मेरा नंबर कहाँ से मिला और वकील से सलाह लेने वाली बात का कैसे पता चला..
मैं ये सब रहस्य समझ भी नहीं पाया था... कि फिर से मेरे फोन पर एक अजनबी नंबर से कॉल आया.. इस बार आवाज एक महिला की थी.. -" ज्योति प्रसाद जी मैं मिलन की पत्नी बोल रही हूँ.."
मैं चौंका .. मिलन की पत्नी मुझे क्यों फोन करेगी... मैंने उन्हें औपचारिक नमस्कार किया... और पूछा--"कहिये आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?"
"भाई साहब आपको कुछ बताने की आवश्यकता तो हैं नहीं आप सब जानते ही हैं...बस आपसे एक बात पूछती हूँ.. आपको मेरे और मिलन के तलाक में क्या इंटरेस्ट है?"

"मुझे क्या इंटरेस्ट होने लगा?"

"फिर आपने मिलन को अपने घर में एक हफ्ता क्यों रखा और क्यों उन्हें वकील से मिलाया..."

मुझे आश्चर्य था कि कोई हमारा कॉमन फ्रेंड नहीं फिर इतनी पुख्ता जानकारी इन्हें कहाँ से मिली.. मैंने अनजान बनने का अभिनय करते हुए जबाब दिया--"देखिये भाभी जी अगर कोई मित्र अपनी परेशानी बताकर अपने पास कुछ समय गुजरने का आग्रह करे तो इंसानियत के नाते क्या उसे नहीं रखना चाहिए.. बात बाकि आप दोनों के बीच के खटास पूर्ण रिश्तो की तो जब तक मैं एक पक्ष को जानता हूँ तब तक कुछ निर्णय नहीं कर सकता...मैं आज तक इस बात को समझने में खुद को नाकामयाब पाता हूँ कि आपके कारण मिलन साहब रितु के करीब गए है या रितु के कारण आपसे दूर..?"
" भाई साहब .. आप बताइए कोई लड़की किसलिए शादी करती है ?मुझसे शादी करके मिलन रितु के साथ प्रेम करें ये बात मैं कैसे बर्दास्त करूँ?"

"जी ये ही समझना मुस्किल है.." 

एक दिन ये बाथरूम में थे तो रितु का फोन आया था ..मैंने फोन उठाया और उससे पूछा --तू मेरे पति को मुझसे क्यों छीन रही है तो उसका जबाब था--मैं छीन रही हूँ या तुम छीन रही हो...मिलन तुम्हारे पति थे जब थे अब वो मेरे हैं...आप उन्हें छोड़ दीजिये ताकि हम दोनों चैन से रह सकें.. "
"ओह उसे ऐसा नहीं कहना चाहिए था.. पता नहीं वो किस दुनिया में जी रही है.. ख्याली दुनिया में जयादा देर नहीं रहा जाता.. जिस दिन ख्यालों से बाहर आएगी उसे यथार्थ के दर्शन होंगे तब तक सब कुछ लुट चूका होगा.."

"लेकिन भाई साहब आश्चर्य इस बात का है कि आप जैसा लेखक भी गलत का साथ दे रहा है..मुझे इस बात से दुःख भी है और वेदना भी.."

"आप मुझसे क्या उम्मीद करती हैं ?"

"मैं चाहती हूँ कि आप मिलन और रीतू का साथ न दें.."

रितु से मुझे कोई वास्ता नहीं लेकिन आपसे बात करके मुझे यकीन हो गया कि वास्तव में मुझसे कुछ चूक हुई है.. भविष्य में मैं अधिक सावधान रहूँगा.. लेकिन दो सवाल मुझे भी कचोट रहे हैं ---एक आपको मिलन के मेरे पास आने की जानकारी और वकील से मुलाकात कराने का इल्म कैसे हुआ ? दूसरा आप लोग दोनों के बीच ऐसे हालात कैसे हुए ?" 
"जी पहले सवाल का जबाब है मिलन की जेब से वकील का कार्ड मिला और जब मिलन आपके पास से वापिस आये तो उनके मोबाइल में आपके नंबर पर कॉल थी.. मुझे शक हुआ..मैंने आपका नंबर अपने मोबाइल में फीड कर लिया..पापा ने आपसे बात की तो मेरा शक यकीन में बदल गया और मिलन से जब मैंने पूछा तो तव में आकर उन्होंने खुद स्वीकार कर लिया.. रहा दूसरा सवाल तो ये मानव मन की फितरत है कि वो बाह्य सौन्दर्य की ओर भागता है.. मिलन जब स्नातक में पढ़ते थे तो हमारी शादी हो गयी उसके बाद ये दिल्ली पढने आ गए,.. और मैं गॉव में ही रही.. बी.एड. के बाद मैंने इनसे जिद्द की कि मुझे भी बी.एड करना है तो ये मुझे लेकर अशोक विहार आये.. तब तक सब ठीक था..मेरा बी.एड. में एडमिशन नहीं हुआ ..इनका एडमिशन एम्.एड में हो गया.. उसके बाद पता नहीं क्यों ये उस चुड़ैल के चंगुल में फंस गए..मैंने सुना था कि बिहार से जो लोग दिल्ली पढने आते है वो अपनी गॉव में रहने वाली पत्नी को भूल यहाँ कि सुन्दर लड़कियों के चक्कर में पद जाते हैं लेकिन मैं अक्सर सोचती थी मेरे मिलन जी ऐसे नहीं करेंगे.. वो मुझे बेहद प्यार करते हैं..लेकिन मुझे क्या पता था कि मेरे साथ भी धोखा ही होगा..?"

"जी भाभी जी मैं आपका दर्द समझ सकता हूँ.. मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है..मैं आपसे वायदा करता हूँ कि मैं मिलन का इस मामले में कोई साथ नहीं दूंगा हाँ लेकिन आप भी मुझसे सिर्फ न्यूट्रल होने की ही उम्मीद कीजियेगा.. मैं आपका भी साथ नहीं दे पाउँगा."

कहकर मैंने फोन काट दिया ..
मेरे मन में द्वंद्व चलता रहा..
समय बीता तो मैं अपनी जिन्दगी में रम बस गया.. डॉ अलका से कभी कबह्र बात हो जाती तो पता चलता कि अब तो कॉलेज में स्टूडेंट्स भी हेड और मिस अवस्थी के चर्चे करते हैं.. उन्ही से पता चला कि एक दिन मिलन की पत्नी ने कॉलेज आकर मिस अवस्थी को छाते से खूब मारा.. हेड साहब अपने केबिन से नहीं निकले..मुझे सुनकर अफ़सोस हुआ..
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रविवार का दिन था सुबह लिखने के लिहाज से लेखन कक्ष में बैठा सिगरेट के कस लगा रहा था ..मोबाइल की घंटी बजी... मैंने फोन की स्क्रीन देखी.. रितु का नाम डिस्प्ले हो रहा था.. रिसीव बटन को ओके किया तो रितु ने कहा--"जी.पी साहब .. पिछले हफ्ते मेरी शादी हो गयी..आपको बुलाना चाह्ती थी लेकिन सब कुछ इतना जल्दी में हुआ कि बुला ही नहीं पायी.."
"क्या करते है आपके पतिदेव ?" 

वो डॉक्टर है ..और बहुत ही अच्छे है.. भाग्यशाली हूँ कि मुझे ऐसा नेक पति मिला..."
"और मिलन साहब ? उनका क्या होगा जो आपके लिए अपनी पत्नी को भी चूदने पर तुले थे..?"

कौन मिलन ? जी.पी. साहब सच कहूँ तो इन ८ दिनों ने सब कुछ भुला दिया.. मिलन कौन थे क्या थे ,, ये मेरे लिए पिछले जन्म जैसी कोई धुंधली कहानी सा है...अतीत से जिन्दगी नहीं जी जाती.. भविष्य की तरफ देखता चाहिये."
मिस अवस्थी बोल रही थी लेकिन जैसे मैं उनके शब्द नहीं सुन पा रहा था....
मेरे कानों में मिलन की पत्नी के शब्द गूंजने लगे.. भाईसाहब आप मिलन का साथ मत दीजियेगा... 
एक शुकून की साँस लेते हुए मैंने मोबाइल का लाल बटन दबा दिया...
समाप्त....