Monday, December 21, 2015

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री
आपने  शिक्षा में गुणात्मक बदलाव के लिए सभी से सुझाव मांगे थे इसी कडी में मंत्री महोदया दिल्ली के छात्रों से भी मुखाबित हुई थी ..ये एक सराहने कदम था और उनके इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए ......भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शिक्षा में बदलाव के लिए सोचना और आम जनता से सुझाव माँगा एक साहसिक कदम तो है ही. ......मंत्री महोदया को बच्चो ने कुछ सुझाव दिए थे  मसलन सीबीएसई पुनः दसवीं कि बोर्ड की परीक्षा की बहाली करे ..... दूसरा १२वीं के एग्जाम और कोम्पीटेटीव एग्जाम का सिलेबस एक ही हो ......मतलब अब छात्र आकाश  इंस्टिट्यूट और एल एन इंस्टिट्यूट कोटा में अपने माता पिता की गाढ़ी कमाई को सुवाह करने के इच्छुक नहीं हैं ........मंत्री महोदया आप जानती होंगी कि पुरे भारतवर्ष में ये कुकुरमुत्ते और बड़े वाट वृक्ष स्कूल शिक्षा की चूल हिला रहे हैं .....पूर्व के मंत्रियों ने पहले ही शिक्षा के निजीकरण को अघोषित रूप से लागु किया हुआ है ....सरकारी शिक्षा तंत्र को विभिन्न तरीके अपनाकर छिन्न- भिन्न किया हुआ है ........ये इंस्टिट्यूट कोम्पीटेटीव एग्जाम में सफल होने वाले छात्रों की संख्या के कई हज़ार गुना छात्रों को इंजिनियर , डॉक्टर , इत्यादि बनने का सपना दिखाते है ...जबकि सच्चाई ये है कि इनमे पढने वाले बच्चो का एक प्रतिशत ही सफल हो पाते है .... बच्चो का भविष्य तो ये नहीं बना पाते अलबत्ता अपनी संतान का ऐसा भविष्य बना जाते है कि अगली सात पीढ़ियों तक को कुछ बनने की जरुरत ही नहीं होती...और अब तो इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों का आत्महत्या की और अग्रसर होना माता पिता के लिए गहन चिंता का विषय बना हुआ है।
मंत्री महोदया इस और वास्तव में ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ......ताकि सरकारी जमात के मास्टर के मुंह  से निकम्मे होने का कलंक  भी धुल सके ...सनद रहे कि सरकारी अध्यापक वही करता है जो सरकार की मनसा होती है .....बच्चो ने cce पैटर्न की भी आलोचना की है एक जागरूक शिक्षक होने के नाते मैं भी इस पैटर्न की आलोचना करता हूँ .....बिना पढ़े या बिना स्कूल आये पास होने की परम्परा देश के भविष्य को पूर्ण अन्धकार में धकेल देगी ऐसा मेरा अनुमान है .......
मंत्री महोदया आपने शिक्षा पर सुझाव मांगे थे तो कुछ बाते हैं जो आपसे साझा करना चाहता हूँ--------
अनिल सदगोपाल की पुस्तक "शिक्षा में बदलाव का सवाल" एक बार अवश्य पढ़ें ......मुझे लगता है कि अगर कोई अध्यापक या शिक्षाविद इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया तो निसंदेह वह शिक्षा विमर्श से अभी तक अछुता है.....
नई शिक्षा नीति १९८६ एक वृहद नीति है उसको पूर्ण रूप से कैसे लागू किया जाये इस पर विचार करने की आवश्यकता है ...ऐसा मुझे लगता है .....
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा प्रणाली हमारी व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है ...ये व्यवस्था रटकर उगलने की नीति पर ज्यादा बल देती है जिसे पाउलो फ्रेरे बैंकीय अवधारणा कहते है ......इससे शिक्षा को निजात दिलाने की अवश्यक्ताव है इसके लिए आप सपुस्तक प्रणाली की शुरुवात करे जिसमे प्रश्नपत्र का पैटर्न बदलना होगा ...ताकि बच्चे को पता रहे कि किस पुस्तक में कौन सा टॉपिक किस तरह से बताया गया है और वो इससे विश्लेषण सीख सकेंगे उनकी तर्क क्षमता का विकास होगा और वो जागरूक भी हो सकेंगे ......
अगर आप और हमारे शिक्षाविद मानते है कि देश के नौनिहाल देश का भविष्य हैं तो मुझे लगता है कि "शिक्षा का अधिकार" कानून की समीक्षा की जाये...
स्कूल में बुनियादी सुविधा दिए बगैर शिक्षा में सुधार की बात सोचना सूरज को दीपक दिखने जैसा होगा .... छात्र -अध्यापक अनुपात सही किये बैगर आप शिक्षा में बदलाव लाना तो दूर इसमें रत्तीभर भी  परिणाम की उम्मीद नहीं कर सकते .....
अत्यंत उर्जावान अध्यापक रोज़ अपनी उर्जा को १००-११० छात्रो की कक्षा में मात्र अनुशासन बनाने के नाम पर जाया करता है ...उसकी उर्जा के सदुपयोग के बारे में आप विचार करें .......
आपका एक अध्यापक
संदीप तोमर

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