Wednesday, May 25, 2016

रात फिर कुछ यूँ दिल्ली के हालात थे
बिजली गुल थी मिले जूते और लात थे
सोये थे रहनुमा चादर तान के रात भर
देखो आमजन को नसीब में फुटपाथ थे
सर्दी में बना रेन बसेरा हो गयी जिम्मेवारी पूरी
गर्मी में जो झुलसे वो क्या लावारिश लाश थे
समझ कर हमको यूँ खैरात न हो बेखबर
हम तो पहले ही मुफ़्त बिजली पानी के खिलाफ थे
यूँ वादों से दिल नहीं भरता मेरे रकीब
दो पल की बिजली लिख दो अपने भी नसीब
रात भर जागकर दिन की रोजी नहीं कमती
यूँ किसी की सियासत ज्यादा देर नहीं चलती।
यूँ किसी की सियासत ज्यादा देर नहीं चलती।

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