Wednesday, May 25, 2016

विशेष
सीमा सिंह एक सशक्त कथाकार है.. उनका लेखन जितना गंभीर हैं उतना ही सरल सौम्य व्यवहार रखती हैं..वे एक कुशल गृहणी, एक अच्छी माँ और एक व्यवहार कुशल स्त्री हैं.. एक लेखिका के रूप में कभी विवादित नहीं रही.. कहानी और लघुकथा पर बराबर का दखल रखती हैं.. सीमा सिंह कभी किसी साहित्यिक गुटबाजी में विश्वास नहीं रखती..सीमा सिंह की शिक्षा-दीक्षा बिजनौर में हुई.. पिताजी के अध्यापक होने का प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर खूब परिलक्षित होता है.. कानपुर में रहकर सतत लेखन कर रही है. प्रख्यात साहित्यकार संदीप तोमर की खास बातचीत लेखक संघ के पाठको के लिए :
संदीप तोमर : सीमा जी आप कथा लेखन में एक जाना माना नाम हैं इस प्रसिद्धि का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
सीमा सिंह : सबसे पहले तो मुझे नही लगता कि मैं कोई बहुत बड़ा नाम हूँ। हाँ जो भी मेरी थोड़ी बहुत उपलब्धि या पहचान है वो सोशल मीडिया और ओपन बुक्स ऑनलाइन वेबसाइट को जाती है। जहाँ से मैने लेखन का ककहरा सीखा है।
संदीप तोमर : आपने लेखन कब शुरू किया और किस विधा में पहली रचना हुई?
सीमा सिंह : यूँ तो लेखन के बीज बालपन से ही थे कहीं न कही, पर गम्भीरतपूर्वक लेखन विवाह बाद आरम्भ किया । मेरी पहली रचना एक कहानी थी बाज़ार की सैर।
संदीप तोमर : "बाजार की सैर "कहानी के पीछे सोच क्या थी? उसके कथानक के बारे में कुछ कहना है आपको? पहली रचना किसी भी रचनाकार के लिए कथ्य के लिए न सही लेकिन भाव के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है...
सीमा सिंह : बाजार की सैर एक हलकी फुलकी रचना है। जिसमें माँ अपनी बेटी के साथ बाज़ार जाती है और वहां उसका कोई काम नही हो पाता और बेटी नाराज़ भी हो जाती है। हा हा दरसल ये कथा मेरे अपने ही रोजमर्रा के जीवन से निकली है।
संदीप तोमर : अमूमन देखा जाता है कि अधिकांश कविता से लिखना शुरू करते हैंऔर कुछ दिन कविता लिखकर कहींगुमनामी का शिकार हो जाते हैं ऐसे में कहानी जैसी ससक्त विधा में लिखना बहुत कठिन है .. कैसे आप ये सब कर पाई?
सीमा सिंह : कहानियां मुझे हमेशा से आकर्षित करती थीं। हमारे घर में पढ़ने का वातावरण था। पिताजी स्वयं अध्यापक थे तो पढ़ने का महत्व बखूबी समझते थे। बस बचपन का पढ़ा और युवावस्था का जिया अनुभव कहानी के रूप में कागज पर उतर आया। विधा कोई कठिन नही होती बस आपकी रूचि पर निर्भर है कि आप अपने भाव कैसे अभिव्यक्त कर पातें हैं।
संदीप तोमर : आपकी कहानियों में समाज में व्याप्त बुराइयाँ बहुत महीन रूप में आकर विस्तार लेती हैं.. आपके कथानक अनूठे होते हैं.. कथानक के चुनाव के लिए आप क्या प्रक्रिया अपनाते हो? अमूमन घटनाये सबके सामने लगभग वही घट रही होती है ..लेकिन सबकी दृष्टि वहां तक नहीं जा पाती?
सीमा सिंह : कथानक ढूढ़ने हमें कही बाहर नही जाना होता है संदीप भाई ये तो आप भी मानेंगे। सब हमारे आस पास ही हैं। बस आवश्यकता होती है उसको अपने नज़रिये से देखने की। लेखक की संवेदनशीलता का बड़ा रोल होता है इस प्रक्रिया में।
संदीप तोमर : जी सीमा जी ,, आपकी कहानियां पढ़कर लगता है कि ये घटना यहीं कहीं घट रही है यह गुण एक कथाकार को सफल बनाता है..समाज में व्याप्त बुराइयों को क्या साहित्य के माध्यम से दूर किया जा सकता या फिर इसे मात्र लेखन की पीड़ा तक ही सीमित समझा जाए? .
सीमा सिंह : ये प्रश्न बहुत अच्छा उठाया आपने। आमतौर पर लेखक की रचनाओ पर ऐसे प्रश्न उठ खड़े होते हैं विशेषतः लघुकथा के संदर्भ में। हम आप जिस वर्ग से समवद्ध है वहाँ हमारा नैतिक दायित्व है कि मात्र समस्या नही समाधान की भी बात की जाए। साथ ही आलोचकों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि अंततोगत्वा हम है तो रचनाकार ही हम भी पीड़ा महसूस करते है और वह कलम से निकलती है।
समस्या की और ध्यान दिलाना भी हमारे दायित्व की पूर्ति करता ही है।
संदीप तोमर : स्वातंत्र्योत्तर युग में बहुत सी लेखिकाएं आई जो आज भी लिख रही हैं.. आप खुद को किसके लेखन के अधिक नजदीक पाती है? या यूँ कहूँ कि किस लेखिका का प्रभाव आप पर अधिक पड़ा है?
सीमा सिंह : प्रभाव तो नही कह सकती पर शिवानी जी ऐसी लेखिका रही हैं जिनकी लेखन शैली ने बहुत प्रभावित किया है। उनका विषय चयन भाषा प्रस्तुति सब मिल कर बहुत प्रेरित किया है मुझे। यदि उनके लेखन का शतांश भी मिल जाये तो स्वयं को धन्य समझूँगी।
उनके पात्र अनूठे होते हैं और परिकल्पना कमाल की
संदीप तोमर : अधिकांश लेखिकाओं पर ये आरोप लगाया जाता है कि वे खुद के लेखन को पति प्रेमी या बेड रूम की वेदना से आगे नहीं जाने देना चाहती.. अमृता प्रीतम जैसी नामचीन लेखिका भी इस आरोप का शिकार रही.. ऐसे में आपका लेखन विवधता से भरा है .. इसके पीछे कोई विशेष कारण?
सीमा सिंह : जी साहित्य जगत में एक स्लोगन चलता है रातों रात प्रसिद्धि पानी है तो विवादास्पद विषयों पर लिखें आधा काम रचना बचा काम आलोचक कर देंगे।
मुझे महिलाओं की पीड़ा ने हमेशा अपनी ओर खींचा है। नारी वेदना बेडरुम से बाहर भी उतनी ही पीड़ा दायक है।
संदीप तोमर : क्या आप ये कहना चाहती है कि प्रसिद्धि लेखन से अधिक महत्वपूर्ण है?
सीमा सिंह : मेरे लिए तो नही । लेखन मेरे लिए पूजा जैसा पवित्र कर्म है जो आत्माभिव्यक्ति और अंतर्वेदना के प्रस्फुटन के लिए नितांत आवश्यक है।
सस्ती लोकप्रियता के संदर्भ में बताया स्लोगन।
संदीप तोमर : पुरुष लेखन और महिला लेखन जैसा कुछ आप भी समझती हैं ?....इसमें आप क्या फर्क देखती हैं ?
सीमा सिंह : मुझे ऐसा कोई अंतर नज़र नही आता है । लेखक का संवेदन शील होना आवश्यक है। महिला और पुरुष होने से उतना अंतर नही होता। हां कुछ कथ्य अवश्य ऐसे है जहाँ महिलाये अधिक अच्छी तरह से अपनी बात रख सकेंगी।
संदीप तोमर : जैसे?
ये कथन खुद इस अंतर को खड़ा करने के लिए काफी नहीं है ?
सीमा सिंह : आप जिस पीड़ा से कभी गुज़रे ही न हो आप उसकी अनुभूति कैसे कर सकतें हैं। नारी के मन की वेदना नारी ही अधिक अनुभव कर सकेगी।
संदीप तोमर : अच्छा अपने प्रकाशित साहित्य और आगामी योजना के बारे में आप कुछ रोशनी डालना चाहेंगे?
सीमा सिंह : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती है समय समय पर। आज कल लघुकथाओं पर काम कर रही हूँ। जल्दी ही संग्रह के रूप में आप सबके सामने आएँगी।
संदीप तोमर : एक अंतिम सवाल : नवोदित लेखको के लिए आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?
सीमा सिंह :सच तो ये कि सीखने की प्रक्रिया सतत चलती रहनी चाहिए। जो लेखन से नए जुड़ रहे है उनसे बस इतना कहना चाहूंगी कि आप चाहे जो भी विधा चुनो उस पर टिक कर काम करें । विधाएँ सभी भावनाओ की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इधर से उधर भागना उचित नही है।
सब जगह हाथ आजमाने से बेहतर होगा एक विधा को गम्भीरता से आत्मसात करना।
संदीप तोमर: लेखक संघ के पाठको को कोई सन्देश?
सीमा सिंह : जी बिल्कुल हार्दिक अभिनन्दन ह्रदय से आभार लेखक संघ के पाठको का भी और आपका भी संदीप भाई।
संदीप तोमर : लेखक संघ परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है.. हमारे पाठको के लिए समय निकलने के लिए आपका बहुत बहुत आभार/

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