Wednesday, May 25, 2016

लेखक अपने आप को सीमाओं में नहीं बांधता
साक्षात्कार
(संदीप तोमर व अखिलेश द्विवेदी “अकेला”)
डॉ रामदरश मिश्र जी एक ऐसे लेखक हैं जो कभी विवादों में नहीं रहे/ सतत लिखते रहे/ लगभग ६० वर्षों से अधिक लेखन करने के बाद भी उनमे एक बच्चे की भांति जिजीविषा है/ उन्होंने अपने लेखन के लम्बे कालक्रम में अनेक बदलाव देखे/ भारत के लोकतंत्र के शैशव से प्रौढ़ होते काल के वो साक्षी रहे/इस दौरान साहित्य गाँधीवादी विचारधारा से लोहियावाद,समाजवाद, मार्क्सवाद से यात्रा करते हुए राष्ट्रवाद तक का साक्षी रहा है और इस यात्रा का प्रभाव भी साहित्य में प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष प्रकट होता रहा है/
यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि डॉ. रामदरश इस लम्बे कालक्रम में विभिन्न सोपानो को अपने लेखन में समेटते रहे/ साहित्य के इस बड़े हस्ताक्षर से लेखक संघ के संस्थापक और साहित्यकार संदीप तोमर और कथाकार अखिलेश द्विवेदी “अकेला” उनके निवास स्थान पर मिलने गए/ साहित्य अकादमी पुरस्कार की औपचारिक बधाई के पश्चात जो अनोपचारिक बातचीत हुई उसे कलमबद्ध करके पाठको के सम्मुख प्रस्तुत किया जा रह है ---
अकेला जी : आपके समवर्ती लेखकों में अधिकांश विवादों में रहे या फिर घेरेबंदी में लिप्त रहे /आप इस तरह के लोगो के बीच भी तठस्थ रहे / ऐसा कैसे कर पाए आप?
मिश्रजी: लेखक किसी एक का नहीं होता /लेखक न संघी होता है न ही कांग्रेसी या कोई अन्य /लेखक की स्वयं की दृष्टि होती है/लेखक का काम होता है गलत का विरोध करना /आप स्वयं को किसी एक विचारधारा में नहीं बांध सकते/ लेखक की नजर में सब रहता है.उसकी दृष्टि में कुछ छिपा नहीं होता.उसका फर्ज होता है कि वो तठस्थ होकर लिखे/
अकेलाजी : मैं कुछ अच्छे रचनाकारों को जानता हूँ जो अच्छी रचना करने का मांदा रखते हैं तथापि किसी एक विचारधारा से प्रभावित होकर अपने विचारों की व्यापकता को कुंद कर रहे हैं/
मिश्रजी: आप कोई भी हैं आप भले ही लोहियावादी हैं भले ही मार्क्सवादी है या फिर गांधीवादी आपकी दृष्टि में समाजवेदना होगी /आप समज के लिए लिख रहे हैं/ कथ्य जीवन है , समाज ही कथ्य है , कविता जीवन से बनती है. ये जितने भी सिद्धांत हैं उन सिद्धांतों पर कविता नहीं लिखी जाती है.सिद्धांतों से जीवन देखा जा सकता है / यही वजह है कि रचना किसी भी वाद से प्रभावित होकर लिखी जाये रचना में अंतर नहीं दिखता. इसलिए रचना में सभी विचारधाराओं में समानता परिलक्षित होती है/
संदीप तोमर : नए रचनाकार भी इन वादों से प्रभावित हैं /आपकी दृष्टि में आपके युग के रचनाकरों में और नए लेखकों में आप क्या अंतर पाते हैं..हालाकि आपको किसी युग में बांटकर नहीं देखा जा सकता/
मिश्रजी: (हँसते हुए) नया लेखक अच्छा लिख रहा है. विभिन्न विधाओं में लिख रहा है.
अभी लोग अतुकांत लिख रहे हैं. जिसे मैं गद्य छंद कहता हूँ. अभी गद्य छंद का का दौर है. छंद लिखने वालो की संख्या बहुत कम है.लिखते तो बहुत हैं लेकिन टिक नहीं पाते. बचते कम ही हैं.
हर समय में अच्छा बुरा सब लिखा जाता रहा है.. इस बीच कुछ नयी विधाएं भी आई हैं. ऐसी ही एक विधा है हाइकू जो जपान से आई है. हाइकू लिखने की भी एक भेड चाल सी आई है..कुछ लोगो ने लिखना शुरू किया बाकि सब भी देखादेखी लिखने लगे हैं/
संदीप तोमर: हाइकू जैसी विधाओं का भारतीय साहित्य पर क्या प्रभाव परिलक्षित हो रहा है? इसे आप किस रूप में देखते हैं. कम शब्दों की विधा है. बिना मेहनत के कोई लिखता है तो बुराई क्या है?
मिश्रजी: हाइकू कठिन विधा है. कम शब्दों में अपनी बात कहना मुश्किल काम है लोग लिख भी रहे हैं. इस शैली में ज्यादा कुछ कहने को नहीं है.बहुत सशक्त विधा मैं इसे नहीं मानता. चंद शब्दों (नौ या दस) में कोई क्या सन्देश दे सकता है / अनेक विधाएं हैं जिनमें लोगो ने सन्देश दिया है अपनी बात कही है.दोहा, गजल के साथ कविता में भी अनेक विधाएं हैं, गीत, नवगीत, छंदमय, छंदमुक्त लोगो ने सबमे अपनी बात कही है, कह भी रहे हैं/ ऐसे में मुझे इस विधा का भविष्य ज्यादा उज्ज्वल नहीं लगता/
संदीप तोमर: आपने अभी गीत, नवगीत, इत्यादि का जिक्र किया/ मैंने आपके कुछ गीत पढ़ें हैं लेकिन वो आपके शुरुवाती लेखन के समय के हैं/ आपका गीत लेखन से अन्य विधाओं की ओर पलायन या फिर लगाव का कोई विशेष कारण?
मिश्रजी: मेरे लेखन में कविता की शैलियाँ बदलती रही. गीत पहले लिखे लेकिन बाद में कविता के अन्य रूप मैंने अधिक लिखे. इसका तात्पर्य ये नहीं कि गीत लिखना बंद कर दिया..गीत अभी भी लिखें हैं लेकिन गीत में सारी बातें नहीं कही जा सकती. गीत अभी गया नहीं है. अभी भी चल रहा है.बहुत हैं जो गीत लिख रहे हैं. अच्छे गीत लिखे जा रहे हैं/
कविता विधा अभी गद्य छंद वाली विधा बन गयी है. सभी विधाओं में लोग अपनी बात कह रहे हैं.
अकेला जी: क्या लेखक वामपंथी, मार्क्सवादी या भाजपाई हो सकता है?इस बात के क्या मायने हैं?अगर कुछ लोग ऐसा करते हैं तो क्या वो सही हैं?
मिश्रजी: किसी वाद से प्रभावित होकर दल बनाना मैं उचित नहीं मानता. किसी के साथ उठाना-बैठना अलग बात है /आचरण में किसी वाद से प्रभावित होना अलग बात है.
किसी भी विचारधारा से बिम्ब लिए जा सकते हैं लेकिन लेखक अपने आपको सीमाओं में नहीं बांधता.
त्रिलोचन ने भी भारतीय जनता पार्टी से बिम्ब लिए तो क्या वो भाजपाई हो गए ? अगर संदीप तोमर लेफ्ट से बिम्ब लेते हैं तो उन्हें वामपंथी कहना न्याय नहीं होगा.
किसी को सम्मान मिलता है तो विवाद होता है / मुझे सम्मान मिला तो विवाद नहीं हुआ. मुझे मिले सम्मन को सराहा गया..
संदीप तोमर: आपके लेखन में समाजवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है ऐसे में आपको किस विचारधारा के लेखक के रूप में माना जाये?
मिश्रजी : अगर आपके पास लेखन दृष्टि है तो आप गांधीवादी भी हैं लोहियावादी भी हैं, मार्क्सवादी भी हैं.
मेरा मार्क्सवाद गांधीवाद और लोहियावाद का विरोध नहीं करता. लोहिया के पास एक विजन था लोहिया ईमानदार विचारक थे. लोहिया की ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं है.
आप किसी भी वाद के हों आपके विचार अन्य विचारधाराओं का विरोध न करें.आपका काम है रचनाकर्म , आप इसे ईमानदारी से निभाएं/
अकेलाजी : जातिगत भेदभाव पर आपके विचार ?
मिश्रजी : विवादित मुद्दों पर बोलना मुझे अच्छा नहीं लगता. मैं स्वयं को विवादों से दूर रखता हूँ.
मेरी एक कविता है जिसमे एक इंसान का दर्द है शायद आपको अपने प्रश्न का जबाब मिल जाये—
ये किसका घर है
हिन्दू का
ये किसका घर है
मुस्लमान का
ये किसका घर है
इसाई का
सुबह से ही भटक रहा हूँ
मैं खोजता
वो एक इन्सान का घर
कहाँ गया?......
जातियां ख़त्म हो जाएँ तो कितना अच्छा हो? अभी भी ऐसा है कि उच्च वर्ग के लोग नीचे से उठे लोगो को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं. उनके साथ मार-पीट होती है तो हृदय आहात होता है/
संदीप तोमर: इसकी परिणति धर्मांतरण के रूप में देखी जा सकती है/
मिश्रजी: आपने ठीक कहा, जब कुछ जातियों को हिन्दू होने का लाभ नहीं मिला तो वो धर्मान्तरित हो गए.इस प्रकार की परिघटनाओं से बचने के लिए उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि वो समाज का एक हिस्सा हैं. उनकी अपनी उपयोगिता है..अपनी पहचान है/
अकेलाजी: अभी गॉव पर कम लिखा जा रहा है. आपने कभी गॉव पर बहुत कुछ लिखा था. “जल टूटता हुआ”, “अपने लोग” जैसी कालजयी रचनाएँ आपने की हैं. अब ऐसा क्या है कि लोग गॉव पर नहीं लिख रहे?
मिश्रजी: ऐसा नहीं है/ अभी भी गॉव पर लिखा जा रहा है.. विवेकी राय गॉव पर लिख रहे हैं. आपके उपन्यास “आवें की आग” की भूमिका मैंने लिखी है वो भी गॉव पर लिखी रचना है तो गॉव पर अभी भी लिखा जा रहा है. अनतर सिर्फ इतना है कि पहले सब कुछ सहेजा जा रहा था अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है/
संदीप तोमर : आपकी एक रचना पढ़ी थी –
अभी भी आँखों को खींचते हैं
फूल, पत्ते, मौसम , ऋतुएं
और मैं संवाद करता करता
महकने लगता हूँ..
एक आखिरी सवाल – कहाँ से मिली प्रेरणा कि आप ये रचना लिख गए? लगता है इस उम्र में भी वो “मैं” जिन्दा है?
मिश्रजी: मन कहता है / मन कहता है कि मैं आज भी छोटा बच्चा हूँ. मन में अभी सृजनात्मकता है / मन में बचपन है. प्रकृति के सौन्दर्य से मैं अभी भी ताजगी महसूस करता हूँ. गॉव को जीने के लिए मैं तत्पर रहता हूँ.अब गॉव जाना नहीं हो पाता. तो यहीं मकान के एक हिस्से में बगीचा बना लिया है/ उसमें प्रकृति से जुडाव महसूस कर लेता हूँ.लेकिन गॉव को नहीं भूला जा सकता गॉव जो मन में बसा है जो प्रकृति से लगाव है वही प्रेरणा देता है कि मैं अभी भी जिन्दा हूँ.
शरीर शिथिल है / तन कहता है चुप बैठे रहिये / शरीर स्वस्थ है लेकिन अब थकान हो जाती है.
आप लोग नव लेखन कर रहे हैं/ लिखिए, अच्छा लिखिए, विवादों से बचिए , मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं. अच्छा अब विदा चाहूँगा , मेरे विश्राम का समय हो गया.
( साहित्य अकादमी पुरस्कार की शुभकामना के साथ संदीप तोमर और अखिलेश द्विवेदी “अकेला” ने विदा ली. और यादगार के तौर पर एक छायाचित्र)
प्रस्तुति
संदीप तोमर
(रचनाकार )
विशेष
सीमा सिंह एक सशक्त कथाकार है.. उनका लेखन जितना गंभीर हैं उतना ही सरल सौम्य व्यवहार रखती हैं..वे एक कुशल गृहणी, एक अच्छी माँ और एक व्यवहार कुशल स्त्री हैं.. एक लेखिका के रूप में कभी विवादित नहीं रही.. कहानी और लघुकथा पर बराबर का दखल रखती हैं.. सीमा सिंह कभी किसी साहित्यिक गुटबाजी में विश्वास नहीं रखती..सीमा सिंह की शिक्षा-दीक्षा बिजनौर में हुई.. पिताजी के अध्यापक होने का प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर खूब परिलक्षित होता है.. कानपुर में रहकर सतत लेखन कर रही है. प्रख्यात साहित्यकार संदीप तोमर की खास बातचीत लेखक संघ के पाठको के लिए :
संदीप तोमर : सीमा जी आप कथा लेखन में एक जाना माना नाम हैं इस प्रसिद्धि का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
सीमा सिंह : सबसे पहले तो मुझे नही लगता कि मैं कोई बहुत बड़ा नाम हूँ। हाँ जो भी मेरी थोड़ी बहुत उपलब्धि या पहचान है वो सोशल मीडिया और ओपन बुक्स ऑनलाइन वेबसाइट को जाती है। जहाँ से मैने लेखन का ककहरा सीखा है।
संदीप तोमर : आपने लेखन कब शुरू किया और किस विधा में पहली रचना हुई?
सीमा सिंह : यूँ तो लेखन के बीज बालपन से ही थे कहीं न कही, पर गम्भीरतपूर्वक लेखन विवाह बाद आरम्भ किया । मेरी पहली रचना एक कहानी थी बाज़ार की सैर।
संदीप तोमर : "बाजार की सैर "कहानी के पीछे सोच क्या थी? उसके कथानक के बारे में कुछ कहना है आपको? पहली रचना किसी भी रचनाकार के लिए कथ्य के लिए न सही लेकिन भाव के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है...
सीमा सिंह : बाजार की सैर एक हलकी फुलकी रचना है। जिसमें माँ अपनी बेटी के साथ बाज़ार जाती है और वहां उसका कोई काम नही हो पाता और बेटी नाराज़ भी हो जाती है। हा हा दरसल ये कथा मेरे अपने ही रोजमर्रा के जीवन से निकली है।
संदीप तोमर : अमूमन देखा जाता है कि अधिकांश कविता से लिखना शुरू करते हैंऔर कुछ दिन कविता लिखकर कहींगुमनामी का शिकार हो जाते हैं ऐसे में कहानी जैसी ससक्त विधा में लिखना बहुत कठिन है .. कैसे आप ये सब कर पाई?
सीमा सिंह : कहानियां मुझे हमेशा से आकर्षित करती थीं। हमारे घर में पढ़ने का वातावरण था। पिताजी स्वयं अध्यापक थे तो पढ़ने का महत्व बखूबी समझते थे। बस बचपन का पढ़ा और युवावस्था का जिया अनुभव कहानी के रूप में कागज पर उतर आया। विधा कोई कठिन नही होती बस आपकी रूचि पर निर्भर है कि आप अपने भाव कैसे अभिव्यक्त कर पातें हैं।
संदीप तोमर : आपकी कहानियों में समाज में व्याप्त बुराइयाँ बहुत महीन रूप में आकर विस्तार लेती हैं.. आपके कथानक अनूठे होते हैं.. कथानक के चुनाव के लिए आप क्या प्रक्रिया अपनाते हो? अमूमन घटनाये सबके सामने लगभग वही घट रही होती है ..लेकिन सबकी दृष्टि वहां तक नहीं जा पाती?
सीमा सिंह : कथानक ढूढ़ने हमें कही बाहर नही जाना होता है संदीप भाई ये तो आप भी मानेंगे। सब हमारे आस पास ही हैं। बस आवश्यकता होती है उसको अपने नज़रिये से देखने की। लेखक की संवेदनशीलता का बड़ा रोल होता है इस प्रक्रिया में।
संदीप तोमर : जी सीमा जी ,, आपकी कहानियां पढ़कर लगता है कि ये घटना यहीं कहीं घट रही है यह गुण एक कथाकार को सफल बनाता है..समाज में व्याप्त बुराइयों को क्या साहित्य के माध्यम से दूर किया जा सकता या फिर इसे मात्र लेखन की पीड़ा तक ही सीमित समझा जाए? .
सीमा सिंह : ये प्रश्न बहुत अच्छा उठाया आपने। आमतौर पर लेखक की रचनाओ पर ऐसे प्रश्न उठ खड़े होते हैं विशेषतः लघुकथा के संदर्भ में। हम आप जिस वर्ग से समवद्ध है वहाँ हमारा नैतिक दायित्व है कि मात्र समस्या नही समाधान की भी बात की जाए। साथ ही आलोचकों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि अंततोगत्वा हम है तो रचनाकार ही हम भी पीड़ा महसूस करते है और वह कलम से निकलती है।
समस्या की और ध्यान दिलाना भी हमारे दायित्व की पूर्ति करता ही है।
संदीप तोमर : स्वातंत्र्योत्तर युग में बहुत सी लेखिकाएं आई जो आज भी लिख रही हैं.. आप खुद को किसके लेखन के अधिक नजदीक पाती है? या यूँ कहूँ कि किस लेखिका का प्रभाव आप पर अधिक पड़ा है?
सीमा सिंह : प्रभाव तो नही कह सकती पर शिवानी जी ऐसी लेखिका रही हैं जिनकी लेखन शैली ने बहुत प्रभावित किया है। उनका विषय चयन भाषा प्रस्तुति सब मिल कर बहुत प्रेरित किया है मुझे। यदि उनके लेखन का शतांश भी मिल जाये तो स्वयं को धन्य समझूँगी।
उनके पात्र अनूठे होते हैं और परिकल्पना कमाल की
संदीप तोमर : अधिकांश लेखिकाओं पर ये आरोप लगाया जाता है कि वे खुद के लेखन को पति प्रेमी या बेड रूम की वेदना से आगे नहीं जाने देना चाहती.. अमृता प्रीतम जैसी नामचीन लेखिका भी इस आरोप का शिकार रही.. ऐसे में आपका लेखन विवधता से भरा है .. इसके पीछे कोई विशेष कारण?
सीमा सिंह : जी साहित्य जगत में एक स्लोगन चलता है रातों रात प्रसिद्धि पानी है तो विवादास्पद विषयों पर लिखें आधा काम रचना बचा काम आलोचक कर देंगे।
मुझे महिलाओं की पीड़ा ने हमेशा अपनी ओर खींचा है। नारी वेदना बेडरुम से बाहर भी उतनी ही पीड़ा दायक है।
संदीप तोमर : क्या आप ये कहना चाहती है कि प्रसिद्धि लेखन से अधिक महत्वपूर्ण है?
सीमा सिंह : मेरे लिए तो नही । लेखन मेरे लिए पूजा जैसा पवित्र कर्म है जो आत्माभिव्यक्ति और अंतर्वेदना के प्रस्फुटन के लिए नितांत आवश्यक है।
सस्ती लोकप्रियता के संदर्भ में बताया स्लोगन।
संदीप तोमर : पुरुष लेखन और महिला लेखन जैसा कुछ आप भी समझती हैं ?....इसमें आप क्या फर्क देखती हैं ?
सीमा सिंह : मुझे ऐसा कोई अंतर नज़र नही आता है । लेखक का संवेदन शील होना आवश्यक है। महिला और पुरुष होने से उतना अंतर नही होता। हां कुछ कथ्य अवश्य ऐसे है जहाँ महिलाये अधिक अच्छी तरह से अपनी बात रख सकेंगी।
संदीप तोमर : जैसे?
ये कथन खुद इस अंतर को खड़ा करने के लिए काफी नहीं है ?
सीमा सिंह : आप जिस पीड़ा से कभी गुज़रे ही न हो आप उसकी अनुभूति कैसे कर सकतें हैं। नारी के मन की वेदना नारी ही अधिक अनुभव कर सकेगी।
संदीप तोमर : अच्छा अपने प्रकाशित साहित्य और आगामी योजना के बारे में आप कुछ रोशनी डालना चाहेंगे?
सीमा सिंह : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती है समय समय पर। आज कल लघुकथाओं पर काम कर रही हूँ। जल्दी ही संग्रह के रूप में आप सबके सामने आएँगी।
संदीप तोमर : एक अंतिम सवाल : नवोदित लेखको के लिए आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?
सीमा सिंह :सच तो ये कि सीखने की प्रक्रिया सतत चलती रहनी चाहिए। जो लेखन से नए जुड़ रहे है उनसे बस इतना कहना चाहूंगी कि आप चाहे जो भी विधा चुनो उस पर टिक कर काम करें । विधाएँ सभी भावनाओ की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इधर से उधर भागना उचित नही है।
सब जगह हाथ आजमाने से बेहतर होगा एक विधा को गम्भीरता से आत्मसात करना।
संदीप तोमर: लेखक संघ के पाठको को कोई सन्देश?
सीमा सिंह : जी बिल्कुल हार्दिक अभिनन्दन ह्रदय से आभार लेखक संघ के पाठको का भी और आपका भी संदीप भाई।
संदीप तोमर : लेखक संघ परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है.. हमारे पाठको के लिए समय निकलने के लिए आपका बहुत बहुत आभार/
वो और लोग थे जो इश्क करते रहे
एक हम जो रोजी रोजी में उलझे रहे
इश्क वालो का पलड़ा उठता रहा
रोजी वाला बिन बात खटता रहा
इश्क और रोजी के निराले रंग
न चल पाए दोनों संग संग
एक ने ग़ालिब निकम्मा बना दिया
दूजे ने हमें जंजाल में फंसा दिया
दोनों ने कमबख्त सुख चैन छीना है
बुढ़ापा आते आते कूड़ा बीना है
दोनों से ही यारो सावधान रहना
बताया नहीं था फिर न कहना
रात फिर कुछ यूँ दिल्ली के हालात थे
बिजली गुल थी मिले जूते और लात थे
सोये थे रहनुमा चादर तान के रात भर
देखो आमजन को नसीब में फुटपाथ थे
सर्दी में बना रेन बसेरा हो गयी जिम्मेवारी पूरी
गर्मी में जो झुलसे वो क्या लावारिश लाश थे
समझ कर हमको यूँ खैरात न हो बेखबर
हम तो पहले ही मुफ़्त बिजली पानी के खिलाफ थे
यूँ वादों से दिल नहीं भरता मेरे रकीब
दो पल की बिजली लिख दो अपने भी नसीब
रात भर जागकर दिन की रोजी नहीं कमती
यूँ किसी की सियासत ज्यादा देर नहीं चलती।
यूँ किसी की सियासत ज्यादा देर नहीं चलती।

Monday, December 21, 2015

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री
आपने  शिक्षा में गुणात्मक बदलाव के लिए सभी से सुझाव मांगे थे इसी कडी में मंत्री महोदया दिल्ली के छात्रों से भी मुखाबित हुई थी ..ये एक सराहने कदम था और उनके इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए ......भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शिक्षा में बदलाव के लिए सोचना और आम जनता से सुझाव माँगा एक साहसिक कदम तो है ही. ......मंत्री महोदया को बच्चो ने कुछ सुझाव दिए थे  मसलन सीबीएसई पुनः दसवीं कि बोर्ड की परीक्षा की बहाली करे ..... दूसरा १२वीं के एग्जाम और कोम्पीटेटीव एग्जाम का सिलेबस एक ही हो ......मतलब अब छात्र आकाश  इंस्टिट्यूट और एल एन इंस्टिट्यूट कोटा में अपने माता पिता की गाढ़ी कमाई को सुवाह करने के इच्छुक नहीं हैं ........मंत्री महोदया आप जानती होंगी कि पुरे भारतवर्ष में ये कुकुरमुत्ते और बड़े वाट वृक्ष स्कूल शिक्षा की चूल हिला रहे हैं .....पूर्व के मंत्रियों ने पहले ही शिक्षा के निजीकरण को अघोषित रूप से लागु किया हुआ है ....सरकारी शिक्षा तंत्र को विभिन्न तरीके अपनाकर छिन्न- भिन्न किया हुआ है ........ये इंस्टिट्यूट कोम्पीटेटीव एग्जाम में सफल होने वाले छात्रों की संख्या के कई हज़ार गुना छात्रों को इंजिनियर , डॉक्टर , इत्यादि बनने का सपना दिखाते है ...जबकि सच्चाई ये है कि इनमे पढने वाले बच्चो का एक प्रतिशत ही सफल हो पाते है .... बच्चो का भविष्य तो ये नहीं बना पाते अलबत्ता अपनी संतान का ऐसा भविष्य बना जाते है कि अगली सात पीढ़ियों तक को कुछ बनने की जरुरत ही नहीं होती...और अब तो इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों का आत्महत्या की और अग्रसर होना माता पिता के लिए गहन चिंता का विषय बना हुआ है।
मंत्री महोदया इस और वास्तव में ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ......ताकि सरकारी जमात के मास्टर के मुंह  से निकम्मे होने का कलंक  भी धुल सके ...सनद रहे कि सरकारी अध्यापक वही करता है जो सरकार की मनसा होती है .....बच्चो ने cce पैटर्न की भी आलोचना की है एक जागरूक शिक्षक होने के नाते मैं भी इस पैटर्न की आलोचना करता हूँ .....बिना पढ़े या बिना स्कूल आये पास होने की परम्परा देश के भविष्य को पूर्ण अन्धकार में धकेल देगी ऐसा मेरा अनुमान है .......
मंत्री महोदया आपने शिक्षा पर सुझाव मांगे थे तो कुछ बाते हैं जो आपसे साझा करना चाहता हूँ--------
अनिल सदगोपाल की पुस्तक "शिक्षा में बदलाव का सवाल" एक बार अवश्य पढ़ें ......मुझे लगता है कि अगर कोई अध्यापक या शिक्षाविद इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया तो निसंदेह वह शिक्षा विमर्श से अभी तक अछुता है.....
नई शिक्षा नीति १९८६ एक वृहद नीति है उसको पूर्ण रूप से कैसे लागू किया जाये इस पर विचार करने की आवश्यकता है ...ऐसा मुझे लगता है .....
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा प्रणाली हमारी व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है ...ये व्यवस्था रटकर उगलने की नीति पर ज्यादा बल देती है जिसे पाउलो फ्रेरे बैंकीय अवधारणा कहते है ......इससे शिक्षा को निजात दिलाने की अवश्यक्ताव है इसके लिए आप सपुस्तक प्रणाली की शुरुवात करे जिसमे प्रश्नपत्र का पैटर्न बदलना होगा ...ताकि बच्चे को पता रहे कि किस पुस्तक में कौन सा टॉपिक किस तरह से बताया गया है और वो इससे विश्लेषण सीख सकेंगे उनकी तर्क क्षमता का विकास होगा और वो जागरूक भी हो सकेंगे ......
अगर आप और हमारे शिक्षाविद मानते है कि देश के नौनिहाल देश का भविष्य हैं तो मुझे लगता है कि "शिक्षा का अधिकार" कानून की समीक्षा की जाये...
स्कूल में बुनियादी सुविधा दिए बगैर शिक्षा में सुधार की बात सोचना सूरज को दीपक दिखने जैसा होगा .... छात्र -अध्यापक अनुपात सही किये बैगर आप शिक्षा में बदलाव लाना तो दूर इसमें रत्तीभर भी  परिणाम की उम्मीद नहीं कर सकते .....
अत्यंत उर्जावान अध्यापक रोज़ अपनी उर्जा को १००-११० छात्रो की कक्षा में मात्र अनुशासन बनाने के नाम पर जाया करता है ...उसकी उर्जा के सदुपयोग के बारे में आप विचार करें .......
आपका एक अध्यापक
संदीप तोमर
.
स्पर्श "
उसका घुटना काफी हद तक छिल गया था..खून रिस रहा था.. इधर उधर भी काफी खरोंच आ गयी थी...वो दर्द से कराह रहा था..लोगो से हमदर्दी की उम्मीद में इधर उधर देख रहा था..लोग बाग़ बिना देखे पास से निकल रहे थे..उसे सहानुभूति की कोई किरण दिकह्यी नहीं दी..
वो चौंक गया जा दो कोमल हाथ उसके घायल घुटने को सहलाने लगे.. अपने दुपट्टे के पल्लू से उसके घाव को पोंछा.. जब खून का रिसना बंद नहीं हुआ तो दुपट्टे का एक पल्लू फाड़कर उसके घुटने पर बांध दिया.. और उसे कंधे का सहारा देकर उठाया और कस कर सीने से लगा लिया...हाथों का सहारा देकर वो उसे लेकर घर की और बढ़ गयी..
एक स्पर्श दर्द को भी छूमंतर कर गया..

२. "सोच "
वो बेचारा अलसुबह से कोठी के गटर को बांस की खरपच्ची से साफ़ करने की कोशिश करता रहा.. जब सफलता हाथ न लगी तो उसने कोठी की मालकिन से कहा -"मेम साहबमेन होल में घुसना पड़ेगा.. यहाँ से तो बात नहीं बन रही.."
"
ठीक है भैयाकैसे भी करके इसे साफ़ कर दो.. शाम से गटर बंद पड़ा है. टॉयलेट सीट से पानी और गंद नहीं निकल पा रहा.. आज सुबह से कोई फ्रेस भी नहीं हो पाया.."
"
जी मेम साहब" -कहकर उसने अपने कपडे खोले और गटर में उतर गया.. तकरीबन डेढ़ -दो घंटे की मसक्कत के बाद उसे सफलता हाथ लगी.. वो फावड़े से मेन होल का गंद बाहर निकलता रहा.. जब वो साफ़ सफाई बाहर निकला तो उसने देखाउसकी कमीज पर भी गंद पड गया था..
उसने कोठी की मालकिन को कहा -"मेम साहबमेरी कमीज ख़राब हो गयी है अगर बाबूजी की कोई पुराणी कमीज मिल जाती तो मैं आराम से घर तक पहुँच जाता .. आप मेरे मेहनताने में से पैसे काट सकती हो.."
"
देखती हूँ भैया " -कहकर वो अन्दर गयी और थोड़ी एर बाद एक टी-शर्ट लेकर बहार आई...
और उसे दे दी..
टी-शर्ट पहन और अपनी मजदूरी ले वो गहर की और जाने लगा...टी शर्ट पर लिखा था---if being sexy is a crime ,arrest me..
रास्ते में जो भी उसे देखता हँसने लगता. उसे समझ नहीं आया कि लोग क्यों हँस रहे हैं .. वो रास्ता तय करके घर तक पहुँच ही गया..
३.
वेडनेसडे 
सिर भारी भारी लग रहा था... पढने की कोशिश की लेकिन नहीं पढ़ पाया... लाइट ऑफ करके लेट गया.. रूम का दरवाजा खुला था...मायो ने दरवाजा खटखटाया.. मैंने उसे अन्दर आने को बोला...अन्दर आकर मायो ने पूछा-"सुदीप ट्यूब लाइट ऑफ क्यों है ?क्या हुआ?"
"
कुछ नहीं,,सिर में दर्द है "-मैंने जबाब दिया..
ओह सिर में दर्द है ....सुदीप तुम बैठो मैं अभी ठीक करता हूँ...यीशु सब ठीक करेगा..."
मैं बैठ गया.... मायो ने मेरे हाथ अपने हाथ में लिए और बैठ गया. उसके होंठ बुदबुदा रहे थे... उसने कहा-" कैसा महसूस कर रहे हो ?"
"
ठंडक है... "
"
मैं जीसस से परार्थना किया.. वो सब ठीक करेगा...."--मायो न कहा... फिर उसने ट्यूब लाइट जला दी...
मायो बोला- विजय नगर में चर्च चला करो... प्रार्थना करेगा तो जीसस सब ठीक करेगा... वेडनेसडे को शाम में प्रेयर होता है तुम साथ चलेगा तो जीसस खुश होगा...तुम्हार दोस्त योगेश भी जाता था ..पहले वो दुखी रहता था अब सब ठीक है..उसने बप्तिसा भी ले लिया है "
मुझे बप्तिसा का अर्थ तब समझ नहीं आया..
वेडनेसडे को मायो फिर मेरे रूम में आया.. हम दोनों तैयार होकर चर्च गए.. चर्च में लोग अपना अनुभव सुनाते और कहते कि मैं दुखी था जीसस ने मेरी प्रेयर को सुना.. अब मैं अच्छा महसूस कर रहा हूँ.. ब्रोदर जॉय ने मुझसे कहा- सुदीप तुम भी अपना अनुभव शेयर करों ..मैं उनसे कहता अभी मैं सीख रहा हूँ.. मायो और मैं हर वेडनेसडे चर्च जाने लगे.. ब्रोदर जॉय ने मुझे बाइबल दी... मैंने बाइबल पढना शुरू किया.. मुझे जो अजीब या अच्छा लगता ...मैं उसे अंडर लाइन कर देता... एक दिन फिर चर्च में प्रेयर चल रही थी.. मेरे चेहरे पर अजीब से भाव थे.. ब्रोदर जॉय ने कहा --सुदीप कुछ कहना चाहते हो.. जीसस तुम्हारे साथ है बोलो क्या परेशानी है...मैं खड़ा हुआ और बोला -- ".बाइबल में पेज नंबर इतने पर लिखा है कि महिलाओं का परसिया (चर्च) में जाना मना है.. ऐसा क्यों ?"
ब्रोदर जॉय के चेहरे पर हवाइयां थी.. फिर वो थोडा संभले और बोले-- "चाय के समय बात करेंगे..."
प्रेयर ख़त्म हुई . तो बाहर आकर लोग चाय पीने लगे.. मायो ने मेरे हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया ...ब्रोदर जॉय मेरे पास आये और बोले- सुदीप बिस्किट लो"
मैंने फिर उत्सुकतावश पूछा - वो... महिलाएं...."
वो बोले-"सुदीप तुम्हे ऐसे सवाल सबके सामने नहीं पूछने चाहिए.. तुमने देखा ना मेरे चर्च में महिलाएं हैं ना."
"
फिर ये सब बाइबल में क्यों लिखा...क्या इसमें गलत लिखा?"
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नहीं गलत नहीं लिखा... तुम जानते हो ना महिलाएं कितनी बातूनी होती है... चर्च में आएँगी तो फिर प्रेयर में परेशानी होगी..."
फिर आपने इन्हें अनुमति देकर बाइबल का उलट व्यवहार क्यों किया है?"
ब्रोदर जॉय निरुत्तर थे...
अगले वेडनेसडे मायो का मैं इंतज़ार करता रहा.. शायद मेरा डोर वो खटखाटायेगा ...वो वेडनेसडे होस्टल में रहते नहीं आया...

४.
ऐलान
उसने बड़े जोश के साथ ये ऐलान किया था कि मैं बिना दहेज़ लिए शादी करके एक मिशाल कायम करूँगा..... पिता ने काफी समझाया कि बेटा मेरा समाज में मान सम्मान है..... हम खानदानी ठाकुर हैं...... तुम्हारे दादा जी की थाकुरियत ५० गांवों में चलती थी.... अब वो नहीं रहे तो ये जिम्मा मेरे ऊपर आ गया.... हमारे यहाँ दिन भर भण्डारा चलता रहता है....... बिना दहेज़ की शादी होगी तो सारे ठाकुर समाज में हमारी थू थू होगी....लोग हमारे बारे में बाते बनायेंगे....... सुदीप ने पिता की बाते सुनी तो भी उसका निर्णय नहीं बदला...... 
सुदीप के साथ काम करने वाली सजातीय कमला ने उसे नेहा से मिलवाया ...... नेहा के परिवार  में ६ लड़कियां थी और पिता निहायत ही गरीब..... सुदीप को लगा कि मेरे लिए मिशाल कायम करने और अपने मन मुताबिक शादी करने का इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिल सकता...... उसने नेहा के पिता को शादी के लिए हाँ कर दी.... और अपनी मंशा से उन्हें अवगत करा दिया...... नेहा के पिता ने जब सुना कि बटेऊ बिना बारात और बिना दहेज़ के शादी करना चाहते हैं तो उन्हें लगा कि बिन मांगे मन्नत पूरी हो गयी...... 
सुदीप के घर वालों ने अनमने मन से उसका विवाह कर दिया ...... सुदीप ने वैवाहिक जीवन में भी अपनी पढाई को जरी रखा और वो अधिक अच्छे ओहदे के लिए प्रयास करता रहा..... उसकी पत्नी नेहा उसे पढने को मना करती और पूर्णरूप से घर परिवार ने रच बस जाने का दबाव डालती...... साथ ही रोज़ डिस्को ,,,रेस्तरो जाने की जिद्द करती...... सुदीप के मन में जैसे एक फ़ांस सी गड गयी......अब छोटी छोटी बातों पर विवाद होने लगे......उस दिन तो हद ही हो गयी..... सुदीप की तबियत खराब थी..... और नेहा ने खाना नहीं बनाया था..... सुदीप के कहने पर जबाब मिला आपकी तो रोज़ ही तबियत ख़राब रहती है...... मैं क्या सारा दिन चूल्हे में खटने के लिए हूँ.... ढाबे से खाना माँगा लो...मेरा आज खाना बनाने का बिलकुल मन नहीं है...... विवाद बढ़ गया तो नेहा ने अपना बैग सम्भाला और मायके चली गयी.....
हफ्ते बाद भी नेहा नहीं आई...... आया तो कोर्ट का नोटिस..... सुदीप ने नोटिस पढ़ा जिसमे उसके ऊपर दहेज़ उत्पीडन के चार्जेस लगे थे.... उसे याद आने लगा कि कैसे उसकी सादगीपूर्ण शादी को मिडिया में भी कवरेज मिला था...... आँखे आसुंओ से तर बतर थी और पिता का चेहरा आंसू की बूंदों में तैर रहा था.......


रचनाकार : संदीप तोमर 
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संदीप तोमर 
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नई दिल्ली-११००५९ 
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