Wednesday, May 25, 2016

लेखक अपने आप को सीमाओं में नहीं बांधता
साक्षात्कार
(संदीप तोमर व अखिलेश द्विवेदी “अकेला”)
डॉ रामदरश मिश्र जी एक ऐसे लेखक हैं जो कभी विवादों में नहीं रहे/ सतत लिखते रहे/ लगभग ६० वर्षों से अधिक लेखन करने के बाद भी उनमे एक बच्चे की भांति जिजीविषा है/ उन्होंने अपने लेखन के लम्बे कालक्रम में अनेक बदलाव देखे/ भारत के लोकतंत्र के शैशव से प्रौढ़ होते काल के वो साक्षी रहे/इस दौरान साहित्य गाँधीवादी विचारधारा से लोहियावाद,समाजवाद, मार्क्सवाद से यात्रा करते हुए राष्ट्रवाद तक का साक्षी रहा है और इस यात्रा का प्रभाव भी साहित्य में प्रत्यक्ष / अप्रत्यक्ष प्रकट होता रहा है/
यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि डॉ. रामदरश इस लम्बे कालक्रम में विभिन्न सोपानो को अपने लेखन में समेटते रहे/ साहित्य के इस बड़े हस्ताक्षर से लेखक संघ के संस्थापक और साहित्यकार संदीप तोमर और कथाकार अखिलेश द्विवेदी “अकेला” उनके निवास स्थान पर मिलने गए/ साहित्य अकादमी पुरस्कार की औपचारिक बधाई के पश्चात जो अनोपचारिक बातचीत हुई उसे कलमबद्ध करके पाठको के सम्मुख प्रस्तुत किया जा रह है ---
अकेला जी : आपके समवर्ती लेखकों में अधिकांश विवादों में रहे या फिर घेरेबंदी में लिप्त रहे /आप इस तरह के लोगो के बीच भी तठस्थ रहे / ऐसा कैसे कर पाए आप?
मिश्रजी: लेखक किसी एक का नहीं होता /लेखक न संघी होता है न ही कांग्रेसी या कोई अन्य /लेखक की स्वयं की दृष्टि होती है/लेखक का काम होता है गलत का विरोध करना /आप स्वयं को किसी एक विचारधारा में नहीं बांध सकते/ लेखक की नजर में सब रहता है.उसकी दृष्टि में कुछ छिपा नहीं होता.उसका फर्ज होता है कि वो तठस्थ होकर लिखे/
अकेलाजी : मैं कुछ अच्छे रचनाकारों को जानता हूँ जो अच्छी रचना करने का मांदा रखते हैं तथापि किसी एक विचारधारा से प्रभावित होकर अपने विचारों की व्यापकता को कुंद कर रहे हैं/
मिश्रजी: आप कोई भी हैं आप भले ही लोहियावादी हैं भले ही मार्क्सवादी है या फिर गांधीवादी आपकी दृष्टि में समाजवेदना होगी /आप समज के लिए लिख रहे हैं/ कथ्य जीवन है , समाज ही कथ्य है , कविता जीवन से बनती है. ये जितने भी सिद्धांत हैं उन सिद्धांतों पर कविता नहीं लिखी जाती है.सिद्धांतों से जीवन देखा जा सकता है / यही वजह है कि रचना किसी भी वाद से प्रभावित होकर लिखी जाये रचना में अंतर नहीं दिखता. इसलिए रचना में सभी विचारधाराओं में समानता परिलक्षित होती है/
संदीप तोमर : नए रचनाकार भी इन वादों से प्रभावित हैं /आपकी दृष्टि में आपके युग के रचनाकरों में और नए लेखकों में आप क्या अंतर पाते हैं..हालाकि आपको किसी युग में बांटकर नहीं देखा जा सकता/
मिश्रजी: (हँसते हुए) नया लेखक अच्छा लिख रहा है. विभिन्न विधाओं में लिख रहा है.
अभी लोग अतुकांत लिख रहे हैं. जिसे मैं गद्य छंद कहता हूँ. अभी गद्य छंद का का दौर है. छंद लिखने वालो की संख्या बहुत कम है.लिखते तो बहुत हैं लेकिन टिक नहीं पाते. बचते कम ही हैं.
हर समय में अच्छा बुरा सब लिखा जाता रहा है.. इस बीच कुछ नयी विधाएं भी आई हैं. ऐसी ही एक विधा है हाइकू जो जपान से आई है. हाइकू लिखने की भी एक भेड चाल सी आई है..कुछ लोगो ने लिखना शुरू किया बाकि सब भी देखादेखी लिखने लगे हैं/
संदीप तोमर: हाइकू जैसी विधाओं का भारतीय साहित्य पर क्या प्रभाव परिलक्षित हो रहा है? इसे आप किस रूप में देखते हैं. कम शब्दों की विधा है. बिना मेहनत के कोई लिखता है तो बुराई क्या है?
मिश्रजी: हाइकू कठिन विधा है. कम शब्दों में अपनी बात कहना मुश्किल काम है लोग लिख भी रहे हैं. इस शैली में ज्यादा कुछ कहने को नहीं है.बहुत सशक्त विधा मैं इसे नहीं मानता. चंद शब्दों (नौ या दस) में कोई क्या सन्देश दे सकता है / अनेक विधाएं हैं जिनमें लोगो ने सन्देश दिया है अपनी बात कही है.दोहा, गजल के साथ कविता में भी अनेक विधाएं हैं, गीत, नवगीत, छंदमय, छंदमुक्त लोगो ने सबमे अपनी बात कही है, कह भी रहे हैं/ ऐसे में मुझे इस विधा का भविष्य ज्यादा उज्ज्वल नहीं लगता/
संदीप तोमर: आपने अभी गीत, नवगीत, इत्यादि का जिक्र किया/ मैंने आपके कुछ गीत पढ़ें हैं लेकिन वो आपके शुरुवाती लेखन के समय के हैं/ आपका गीत लेखन से अन्य विधाओं की ओर पलायन या फिर लगाव का कोई विशेष कारण?
मिश्रजी: मेरे लेखन में कविता की शैलियाँ बदलती रही. गीत पहले लिखे लेकिन बाद में कविता के अन्य रूप मैंने अधिक लिखे. इसका तात्पर्य ये नहीं कि गीत लिखना बंद कर दिया..गीत अभी भी लिखें हैं लेकिन गीत में सारी बातें नहीं कही जा सकती. गीत अभी गया नहीं है. अभी भी चल रहा है.बहुत हैं जो गीत लिख रहे हैं. अच्छे गीत लिखे जा रहे हैं/
कविता विधा अभी गद्य छंद वाली विधा बन गयी है. सभी विधाओं में लोग अपनी बात कह रहे हैं.
अकेला जी: क्या लेखक वामपंथी, मार्क्सवादी या भाजपाई हो सकता है?इस बात के क्या मायने हैं?अगर कुछ लोग ऐसा करते हैं तो क्या वो सही हैं?
मिश्रजी: किसी वाद से प्रभावित होकर दल बनाना मैं उचित नहीं मानता. किसी के साथ उठाना-बैठना अलग बात है /आचरण में किसी वाद से प्रभावित होना अलग बात है.
किसी भी विचारधारा से बिम्ब लिए जा सकते हैं लेकिन लेखक अपने आपको सीमाओं में नहीं बांधता.
त्रिलोचन ने भी भारतीय जनता पार्टी से बिम्ब लिए तो क्या वो भाजपाई हो गए ? अगर संदीप तोमर लेफ्ट से बिम्ब लेते हैं तो उन्हें वामपंथी कहना न्याय नहीं होगा.
किसी को सम्मान मिलता है तो विवाद होता है / मुझे सम्मान मिला तो विवाद नहीं हुआ. मुझे मिले सम्मन को सराहा गया..
संदीप तोमर: आपके लेखन में समाजवादी दृष्टिकोण दिखाई देता है ऐसे में आपको किस विचारधारा के लेखक के रूप में माना जाये?
मिश्रजी : अगर आपके पास लेखन दृष्टि है तो आप गांधीवादी भी हैं लोहियावादी भी हैं, मार्क्सवादी भी हैं.
मेरा मार्क्सवाद गांधीवाद और लोहियावाद का विरोध नहीं करता. लोहिया के पास एक विजन था लोहिया ईमानदार विचारक थे. लोहिया की ईमानदारी पर किसी को संदेह नहीं है.
आप किसी भी वाद के हों आपके विचार अन्य विचारधाराओं का विरोध न करें.आपका काम है रचनाकर्म , आप इसे ईमानदारी से निभाएं/
अकेलाजी : जातिगत भेदभाव पर आपके विचार ?
मिश्रजी : विवादित मुद्दों पर बोलना मुझे अच्छा नहीं लगता. मैं स्वयं को विवादों से दूर रखता हूँ.
मेरी एक कविता है जिसमे एक इंसान का दर्द है शायद आपको अपने प्रश्न का जबाब मिल जाये—
ये किसका घर है
हिन्दू का
ये किसका घर है
मुस्लमान का
ये किसका घर है
इसाई का
सुबह से ही भटक रहा हूँ
मैं खोजता
वो एक इन्सान का घर
कहाँ गया?......
जातियां ख़त्म हो जाएँ तो कितना अच्छा हो? अभी भी ऐसा है कि उच्च वर्ग के लोग नीचे से उठे लोगो को बर्दास्त नहीं कर पा रहे हैं. उनके साथ मार-पीट होती है तो हृदय आहात होता है/
संदीप तोमर: इसकी परिणति धर्मांतरण के रूप में देखी जा सकती है/
मिश्रजी: आपने ठीक कहा, जब कुछ जातियों को हिन्दू होने का लाभ नहीं मिला तो वो धर्मान्तरित हो गए.इस प्रकार की परिघटनाओं से बचने के लिए उन्हें विश्वास दिलाना होगा कि वो समाज का एक हिस्सा हैं. उनकी अपनी उपयोगिता है..अपनी पहचान है/
अकेलाजी: अभी गॉव पर कम लिखा जा रहा है. आपने कभी गॉव पर बहुत कुछ लिखा था. “जल टूटता हुआ”, “अपने लोग” जैसी कालजयी रचनाएँ आपने की हैं. अब ऐसा क्या है कि लोग गॉव पर नहीं लिख रहे?
मिश्रजी: ऐसा नहीं है/ अभी भी गॉव पर लिखा जा रहा है.. विवेकी राय गॉव पर लिख रहे हैं. आपके उपन्यास “आवें की आग” की भूमिका मैंने लिखी है वो भी गॉव पर लिखी रचना है तो गॉव पर अभी भी लिखा जा रहा है. अनतर सिर्फ इतना है कि पहले सब कुछ सहेजा जा रहा था अभी ऐसा नहीं हो पा रहा है/
संदीप तोमर : आपकी एक रचना पढ़ी थी –
अभी भी आँखों को खींचते हैं
फूल, पत्ते, मौसम , ऋतुएं
और मैं संवाद करता करता
महकने लगता हूँ..
एक आखिरी सवाल – कहाँ से मिली प्रेरणा कि आप ये रचना लिख गए? लगता है इस उम्र में भी वो “मैं” जिन्दा है?
मिश्रजी: मन कहता है / मन कहता है कि मैं आज भी छोटा बच्चा हूँ. मन में अभी सृजनात्मकता है / मन में बचपन है. प्रकृति के सौन्दर्य से मैं अभी भी ताजगी महसूस करता हूँ. गॉव को जीने के लिए मैं तत्पर रहता हूँ.अब गॉव जाना नहीं हो पाता. तो यहीं मकान के एक हिस्से में बगीचा बना लिया है/ उसमें प्रकृति से जुडाव महसूस कर लेता हूँ.लेकिन गॉव को नहीं भूला जा सकता गॉव जो मन में बसा है जो प्रकृति से लगाव है वही प्रेरणा देता है कि मैं अभी भी जिन्दा हूँ.
शरीर शिथिल है / तन कहता है चुप बैठे रहिये / शरीर स्वस्थ है लेकिन अब थकान हो जाती है.
आप लोग नव लेखन कर रहे हैं/ लिखिए, अच्छा लिखिए, विवादों से बचिए , मेरी शुभकामनायें आपके साथ हैं. अच्छा अब विदा चाहूँगा , मेरे विश्राम का समय हो गया.
( साहित्य अकादमी पुरस्कार की शुभकामना के साथ संदीप तोमर और अखिलेश द्विवेदी “अकेला” ने विदा ली. और यादगार के तौर पर एक छायाचित्र)
प्रस्तुति
संदीप तोमर
(रचनाकार )
विशेष
सीमा सिंह एक सशक्त कथाकार है.. उनका लेखन जितना गंभीर हैं उतना ही सरल सौम्य व्यवहार रखती हैं..वे एक कुशल गृहणी, एक अच्छी माँ और एक व्यवहार कुशल स्त्री हैं.. एक लेखिका के रूप में कभी विवादित नहीं रही.. कहानी और लघुकथा पर बराबर का दखल रखती हैं.. सीमा सिंह कभी किसी साहित्यिक गुटबाजी में विश्वास नहीं रखती..सीमा सिंह की शिक्षा-दीक्षा बिजनौर में हुई.. पिताजी के अध्यापक होने का प्रभाव उनके व्यक्तित्व पर खूब परिलक्षित होता है.. कानपुर में रहकर सतत लेखन कर रही है. प्रख्यात साहित्यकार संदीप तोमर की खास बातचीत लेखक संघ के पाठको के लिए :
संदीप तोमर : सीमा जी आप कथा लेखन में एक जाना माना नाम हैं इस प्रसिद्धि का श्रेय आप किसे देना चाहेंगे?
सीमा सिंह : सबसे पहले तो मुझे नही लगता कि मैं कोई बहुत बड़ा नाम हूँ। हाँ जो भी मेरी थोड़ी बहुत उपलब्धि या पहचान है वो सोशल मीडिया और ओपन बुक्स ऑनलाइन वेबसाइट को जाती है। जहाँ से मैने लेखन का ककहरा सीखा है।
संदीप तोमर : आपने लेखन कब शुरू किया और किस विधा में पहली रचना हुई?
सीमा सिंह : यूँ तो लेखन के बीज बालपन से ही थे कहीं न कही, पर गम्भीरतपूर्वक लेखन विवाह बाद आरम्भ किया । मेरी पहली रचना एक कहानी थी बाज़ार की सैर।
संदीप तोमर : "बाजार की सैर "कहानी के पीछे सोच क्या थी? उसके कथानक के बारे में कुछ कहना है आपको? पहली रचना किसी भी रचनाकार के लिए कथ्य के लिए न सही लेकिन भाव के लिहाज से महत्वपूर्ण होती है...
सीमा सिंह : बाजार की सैर एक हलकी फुलकी रचना है। जिसमें माँ अपनी बेटी के साथ बाज़ार जाती है और वहां उसका कोई काम नही हो पाता और बेटी नाराज़ भी हो जाती है। हा हा दरसल ये कथा मेरे अपने ही रोजमर्रा के जीवन से निकली है।
संदीप तोमर : अमूमन देखा जाता है कि अधिकांश कविता से लिखना शुरू करते हैंऔर कुछ दिन कविता लिखकर कहींगुमनामी का शिकार हो जाते हैं ऐसे में कहानी जैसी ससक्त विधा में लिखना बहुत कठिन है .. कैसे आप ये सब कर पाई?
सीमा सिंह : कहानियां मुझे हमेशा से आकर्षित करती थीं। हमारे घर में पढ़ने का वातावरण था। पिताजी स्वयं अध्यापक थे तो पढ़ने का महत्व बखूबी समझते थे। बस बचपन का पढ़ा और युवावस्था का जिया अनुभव कहानी के रूप में कागज पर उतर आया। विधा कोई कठिन नही होती बस आपकी रूचि पर निर्भर है कि आप अपने भाव कैसे अभिव्यक्त कर पातें हैं।
संदीप तोमर : आपकी कहानियों में समाज में व्याप्त बुराइयाँ बहुत महीन रूप में आकर विस्तार लेती हैं.. आपके कथानक अनूठे होते हैं.. कथानक के चुनाव के लिए आप क्या प्रक्रिया अपनाते हो? अमूमन घटनाये सबके सामने लगभग वही घट रही होती है ..लेकिन सबकी दृष्टि वहां तक नहीं जा पाती?
सीमा सिंह : कथानक ढूढ़ने हमें कही बाहर नही जाना होता है संदीप भाई ये तो आप भी मानेंगे। सब हमारे आस पास ही हैं। बस आवश्यकता होती है उसको अपने नज़रिये से देखने की। लेखक की संवेदनशीलता का बड़ा रोल होता है इस प्रक्रिया में।
संदीप तोमर : जी सीमा जी ,, आपकी कहानियां पढ़कर लगता है कि ये घटना यहीं कहीं घट रही है यह गुण एक कथाकार को सफल बनाता है..समाज में व्याप्त बुराइयों को क्या साहित्य के माध्यम से दूर किया जा सकता या फिर इसे मात्र लेखन की पीड़ा तक ही सीमित समझा जाए? .
सीमा सिंह : ये प्रश्न बहुत अच्छा उठाया आपने। आमतौर पर लेखक की रचनाओ पर ऐसे प्रश्न उठ खड़े होते हैं विशेषतः लघुकथा के संदर्भ में। हम आप जिस वर्ग से समवद्ध है वहाँ हमारा नैतिक दायित्व है कि मात्र समस्या नही समाधान की भी बात की जाए। साथ ही आलोचकों को इस बात पर ध्यान देना होगा कि अंततोगत्वा हम है तो रचनाकार ही हम भी पीड़ा महसूस करते है और वह कलम से निकलती है।
समस्या की और ध्यान दिलाना भी हमारे दायित्व की पूर्ति करता ही है।
संदीप तोमर : स्वातंत्र्योत्तर युग में बहुत सी लेखिकाएं आई जो आज भी लिख रही हैं.. आप खुद को किसके लेखन के अधिक नजदीक पाती है? या यूँ कहूँ कि किस लेखिका का प्रभाव आप पर अधिक पड़ा है?
सीमा सिंह : प्रभाव तो नही कह सकती पर शिवानी जी ऐसी लेखिका रही हैं जिनकी लेखन शैली ने बहुत प्रभावित किया है। उनका विषय चयन भाषा प्रस्तुति सब मिल कर बहुत प्रेरित किया है मुझे। यदि उनके लेखन का शतांश भी मिल जाये तो स्वयं को धन्य समझूँगी।
उनके पात्र अनूठे होते हैं और परिकल्पना कमाल की
संदीप तोमर : अधिकांश लेखिकाओं पर ये आरोप लगाया जाता है कि वे खुद के लेखन को पति प्रेमी या बेड रूम की वेदना से आगे नहीं जाने देना चाहती.. अमृता प्रीतम जैसी नामचीन लेखिका भी इस आरोप का शिकार रही.. ऐसे में आपका लेखन विवधता से भरा है .. इसके पीछे कोई विशेष कारण?
सीमा सिंह : जी साहित्य जगत में एक स्लोगन चलता है रातों रात प्रसिद्धि पानी है तो विवादास्पद विषयों पर लिखें आधा काम रचना बचा काम आलोचक कर देंगे।
मुझे महिलाओं की पीड़ा ने हमेशा अपनी ओर खींचा है। नारी वेदना बेडरुम से बाहर भी उतनी ही पीड़ा दायक है।
संदीप तोमर : क्या आप ये कहना चाहती है कि प्रसिद्धि लेखन से अधिक महत्वपूर्ण है?
सीमा सिंह : मेरे लिए तो नही । लेखन मेरे लिए पूजा जैसा पवित्र कर्म है जो आत्माभिव्यक्ति और अंतर्वेदना के प्रस्फुटन के लिए नितांत आवश्यक है।
सस्ती लोकप्रियता के संदर्भ में बताया स्लोगन।
संदीप तोमर : पुरुष लेखन और महिला लेखन जैसा कुछ आप भी समझती हैं ?....इसमें आप क्या फर्क देखती हैं ?
सीमा सिंह : मुझे ऐसा कोई अंतर नज़र नही आता है । लेखक का संवेदन शील होना आवश्यक है। महिला और पुरुष होने से उतना अंतर नही होता। हां कुछ कथ्य अवश्य ऐसे है जहाँ महिलाये अधिक अच्छी तरह से अपनी बात रख सकेंगी।
संदीप तोमर : जैसे?
ये कथन खुद इस अंतर को खड़ा करने के लिए काफी नहीं है ?
सीमा सिंह : आप जिस पीड़ा से कभी गुज़रे ही न हो आप उसकी अनुभूति कैसे कर सकतें हैं। नारी के मन की वेदना नारी ही अधिक अनुभव कर सकेगी।
संदीप तोमर : अच्छा अपने प्रकाशित साहित्य और आगामी योजना के बारे में आप कुछ रोशनी डालना चाहेंगे?
सीमा सिंह : विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित होती है समय समय पर। आज कल लघुकथाओं पर काम कर रही हूँ। जल्दी ही संग्रह के रूप में आप सबके सामने आएँगी।
संदीप तोमर : एक अंतिम सवाल : नवोदित लेखको के लिए आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?
सीमा सिंह :सच तो ये कि सीखने की प्रक्रिया सतत चलती रहनी चाहिए। जो लेखन से नए जुड़ रहे है उनसे बस इतना कहना चाहूंगी कि आप चाहे जो भी विधा चुनो उस पर टिक कर काम करें । विधाएँ सभी भावनाओ की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इधर से उधर भागना उचित नही है।
सब जगह हाथ आजमाने से बेहतर होगा एक विधा को गम्भीरता से आत्मसात करना।
संदीप तोमर: लेखक संघ के पाठको को कोई सन्देश?
सीमा सिंह : जी बिल्कुल हार्दिक अभिनन्दन ह्रदय से आभार लेखक संघ के पाठको का भी और आपका भी संदीप भाई।
संदीप तोमर : लेखक संघ परिवार आपके उज्ज्वल भविष्य की कामना करता है.. हमारे पाठको के लिए समय निकलने के लिए आपका बहुत बहुत आभार/
वो और लोग थे जो इश्क करते रहे
एक हम जो रोजी रोजी में उलझे रहे
इश्क वालो का पलड़ा उठता रहा
रोजी वाला बिन बात खटता रहा
इश्क और रोजी के निराले रंग
न चल पाए दोनों संग संग
एक ने ग़ालिब निकम्मा बना दिया
दूजे ने हमें जंजाल में फंसा दिया
दोनों ने कमबख्त सुख चैन छीना है
बुढ़ापा आते आते कूड़ा बीना है
दोनों से ही यारो सावधान रहना
बताया नहीं था फिर न कहना
रात फिर कुछ यूँ दिल्ली के हालात थे
बिजली गुल थी मिले जूते और लात थे
सोये थे रहनुमा चादर तान के रात भर
देखो आमजन को नसीब में फुटपाथ थे
सर्दी में बना रेन बसेरा हो गयी जिम्मेवारी पूरी
गर्मी में जो झुलसे वो क्या लावारिश लाश थे
समझ कर हमको यूँ खैरात न हो बेखबर
हम तो पहले ही मुफ़्त बिजली पानी के खिलाफ थे
यूँ वादों से दिल नहीं भरता मेरे रकीब
दो पल की बिजली लिख दो अपने भी नसीब
रात भर जागकर दिन की रोजी नहीं कमती
यूँ किसी की सियासत ज्यादा देर नहीं चलती।
यूँ किसी की सियासत ज्यादा देर नहीं चलती।

Monday, December 21, 2015

माननीय मानव संसाधन विकास मंत्री
आपने  शिक्षा में गुणात्मक बदलाव के लिए सभी से सुझाव मांगे थे इसी कडी में मंत्री महोदया दिल्ली के छात्रों से भी मुखाबित हुई थी ..ये एक सराहने कदम था और उनके इस कदम का स्वागत किया जाना चाहिए ......भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में शिक्षा में बदलाव के लिए सोचना और आम जनता से सुझाव माँगा एक साहसिक कदम तो है ही. ......मंत्री महोदया को बच्चो ने कुछ सुझाव दिए थे  मसलन सीबीएसई पुनः दसवीं कि बोर्ड की परीक्षा की बहाली करे ..... दूसरा १२वीं के एग्जाम और कोम्पीटेटीव एग्जाम का सिलेबस एक ही हो ......मतलब अब छात्र आकाश  इंस्टिट्यूट और एल एन इंस्टिट्यूट कोटा में अपने माता पिता की गाढ़ी कमाई को सुवाह करने के इच्छुक नहीं हैं ........मंत्री महोदया आप जानती होंगी कि पुरे भारतवर्ष में ये कुकुरमुत्ते और बड़े वाट वृक्ष स्कूल शिक्षा की चूल हिला रहे हैं .....पूर्व के मंत्रियों ने पहले ही शिक्षा के निजीकरण को अघोषित रूप से लागु किया हुआ है ....सरकारी शिक्षा तंत्र को विभिन्न तरीके अपनाकर छिन्न- भिन्न किया हुआ है ........ये इंस्टिट्यूट कोम्पीटेटीव एग्जाम में सफल होने वाले छात्रों की संख्या के कई हज़ार गुना छात्रों को इंजिनियर , डॉक्टर , इत्यादि बनने का सपना दिखाते है ...जबकि सच्चाई ये है कि इनमे पढने वाले बच्चो का एक प्रतिशत ही सफल हो पाते है .... बच्चो का भविष्य तो ये नहीं बना पाते अलबत्ता अपनी संतान का ऐसा भविष्य बना जाते है कि अगली सात पीढ़ियों तक को कुछ बनने की जरुरत ही नहीं होती...और अब तो इन संस्थानों में पढ़ने वाले बच्चों का आत्महत्या की और अग्रसर होना माता पिता के लिए गहन चिंता का विषय बना हुआ है।
मंत्री महोदया इस और वास्तव में ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है ......ताकि सरकारी जमात के मास्टर के मुंह  से निकम्मे होने का कलंक  भी धुल सके ...सनद रहे कि सरकारी अध्यापक वही करता है जो सरकार की मनसा होती है .....बच्चो ने cce पैटर्न की भी आलोचना की है एक जागरूक शिक्षक होने के नाते मैं भी इस पैटर्न की आलोचना करता हूँ .....बिना पढ़े या बिना स्कूल आये पास होने की परम्परा देश के भविष्य को पूर्ण अन्धकार में धकेल देगी ऐसा मेरा अनुमान है .......
मंत्री महोदया आपने शिक्षा पर सुझाव मांगे थे तो कुछ बाते हैं जो आपसे साझा करना चाहता हूँ--------
अनिल सदगोपाल की पुस्तक "शिक्षा में बदलाव का सवाल" एक बार अवश्य पढ़ें ......मुझे लगता है कि अगर कोई अध्यापक या शिक्षाविद इस पुस्तक को नहीं पढ़ पाया तो निसंदेह वह शिक्षा विमर्श से अभी तक अछुता है.....
नई शिक्षा नीति १९८६ एक वृहद नीति है उसको पूर्ण रूप से कैसे लागू किया जाये इस पर विचार करने की आवश्यकता है ...ऐसा मुझे लगता है .....
वर्तमान शिक्षा व्यवस्था में परीक्षा प्रणाली हमारी व्यवस्था की सबसे कमजोर कड़ी है ...ये व्यवस्था रटकर उगलने की नीति पर ज्यादा बल देती है जिसे पाउलो फ्रेरे बैंकीय अवधारणा कहते है ......इससे शिक्षा को निजात दिलाने की अवश्यक्ताव है इसके लिए आप सपुस्तक प्रणाली की शुरुवात करे जिसमे प्रश्नपत्र का पैटर्न बदलना होगा ...ताकि बच्चे को पता रहे कि किस पुस्तक में कौन सा टॉपिक किस तरह से बताया गया है और वो इससे विश्लेषण सीख सकेंगे उनकी तर्क क्षमता का विकास होगा और वो जागरूक भी हो सकेंगे ......
अगर आप और हमारे शिक्षाविद मानते है कि देश के नौनिहाल देश का भविष्य हैं तो मुझे लगता है कि "शिक्षा का अधिकार" कानून की समीक्षा की जाये...
स्कूल में बुनियादी सुविधा दिए बगैर शिक्षा में सुधार की बात सोचना सूरज को दीपक दिखने जैसा होगा .... छात्र -अध्यापक अनुपात सही किये बैगर आप शिक्षा में बदलाव लाना तो दूर इसमें रत्तीभर भी  परिणाम की उम्मीद नहीं कर सकते .....
अत्यंत उर्जावान अध्यापक रोज़ अपनी उर्जा को १००-११० छात्रो की कक्षा में मात्र अनुशासन बनाने के नाम पर जाया करता है ...उसकी उर्जा के सदुपयोग के बारे में आप विचार करें .......
आपका एक अध्यापक
संदीप तोमर
.
स्पर्श "
उसका घुटना काफी हद तक छिल गया था..खून रिस रहा था.. इधर उधर भी काफी खरोंच आ गयी थी...वो दर्द से कराह रहा था..लोगो से हमदर्दी की उम्मीद में इधर उधर देख रहा था..लोग बाग़ बिना देखे पास से निकल रहे थे..उसे सहानुभूति की कोई किरण दिकह्यी नहीं दी..
वो चौंक गया जा दो कोमल हाथ उसके घायल घुटने को सहलाने लगे.. अपने दुपट्टे के पल्लू से उसके घाव को पोंछा.. जब खून का रिसना बंद नहीं हुआ तो दुपट्टे का एक पल्लू फाड़कर उसके घुटने पर बांध दिया.. और उसे कंधे का सहारा देकर उठाया और कस कर सीने से लगा लिया...हाथों का सहारा देकर वो उसे लेकर घर की और बढ़ गयी..
एक स्पर्श दर्द को भी छूमंतर कर गया..

२. "सोच "
वो बेचारा अलसुबह से कोठी के गटर को बांस की खरपच्ची से साफ़ करने की कोशिश करता रहा.. जब सफलता हाथ न लगी तो उसने कोठी की मालकिन से कहा -"मेम साहबमेन होल में घुसना पड़ेगा.. यहाँ से तो बात नहीं बन रही.."
"
ठीक है भैयाकैसे भी करके इसे साफ़ कर दो.. शाम से गटर बंद पड़ा है. टॉयलेट सीट से पानी और गंद नहीं निकल पा रहा.. आज सुबह से कोई फ्रेस भी नहीं हो पाया.."
"
जी मेम साहब" -कहकर उसने अपने कपडे खोले और गटर में उतर गया.. तकरीबन डेढ़ -दो घंटे की मसक्कत के बाद उसे सफलता हाथ लगी.. वो फावड़े से मेन होल का गंद बाहर निकलता रहा.. जब वो साफ़ सफाई बाहर निकला तो उसने देखाउसकी कमीज पर भी गंद पड गया था..
उसने कोठी की मालकिन को कहा -"मेम साहबमेरी कमीज ख़राब हो गयी है अगर बाबूजी की कोई पुराणी कमीज मिल जाती तो मैं आराम से घर तक पहुँच जाता .. आप मेरे मेहनताने में से पैसे काट सकती हो.."
"
देखती हूँ भैया " -कहकर वो अन्दर गयी और थोड़ी एर बाद एक टी-शर्ट लेकर बहार आई...
और उसे दे दी..
टी-शर्ट पहन और अपनी मजदूरी ले वो गहर की और जाने लगा...टी शर्ट पर लिखा था---if being sexy is a crime ,arrest me..
रास्ते में जो भी उसे देखता हँसने लगता. उसे समझ नहीं आया कि लोग क्यों हँस रहे हैं .. वो रास्ता तय करके घर तक पहुँच ही गया..
३.
वेडनेसडे 
सिर भारी भारी लग रहा था... पढने की कोशिश की लेकिन नहीं पढ़ पाया... लाइट ऑफ करके लेट गया.. रूम का दरवाजा खुला था...मायो ने दरवाजा खटखटाया.. मैंने उसे अन्दर आने को बोला...अन्दर आकर मायो ने पूछा-"सुदीप ट्यूब लाइट ऑफ क्यों है ?क्या हुआ?"
"
कुछ नहीं,,सिर में दर्द है "-मैंने जबाब दिया..
ओह सिर में दर्द है ....सुदीप तुम बैठो मैं अभी ठीक करता हूँ...यीशु सब ठीक करेगा..."
मैं बैठ गया.... मायो ने मेरे हाथ अपने हाथ में लिए और बैठ गया. उसके होंठ बुदबुदा रहे थे... उसने कहा-" कैसा महसूस कर रहे हो ?"
"
ठंडक है... "
"
मैं जीसस से परार्थना किया.. वो सब ठीक करेगा...."--मायो न कहा... फिर उसने ट्यूब लाइट जला दी...
मायो बोला- विजय नगर में चर्च चला करो... प्रार्थना करेगा तो जीसस सब ठीक करेगा... वेडनेसडे को शाम में प्रेयर होता है तुम साथ चलेगा तो जीसस खुश होगा...तुम्हार दोस्त योगेश भी जाता था ..पहले वो दुखी रहता था अब सब ठीक है..उसने बप्तिसा भी ले लिया है "
मुझे बप्तिसा का अर्थ तब समझ नहीं आया..
वेडनेसडे को मायो फिर मेरे रूम में आया.. हम दोनों तैयार होकर चर्च गए.. चर्च में लोग अपना अनुभव सुनाते और कहते कि मैं दुखी था जीसस ने मेरी प्रेयर को सुना.. अब मैं अच्छा महसूस कर रहा हूँ.. ब्रोदर जॉय ने मुझसे कहा- सुदीप तुम भी अपना अनुभव शेयर करों ..मैं उनसे कहता अभी मैं सीख रहा हूँ.. मायो और मैं हर वेडनेसडे चर्च जाने लगे.. ब्रोदर जॉय ने मुझे बाइबल दी... मैंने बाइबल पढना शुरू किया.. मुझे जो अजीब या अच्छा लगता ...मैं उसे अंडर लाइन कर देता... एक दिन फिर चर्च में प्रेयर चल रही थी.. मेरे चेहरे पर अजीब से भाव थे.. ब्रोदर जॉय ने कहा --सुदीप कुछ कहना चाहते हो.. जीसस तुम्हारे साथ है बोलो क्या परेशानी है...मैं खड़ा हुआ और बोला -- ".बाइबल में पेज नंबर इतने पर लिखा है कि महिलाओं का परसिया (चर्च) में जाना मना है.. ऐसा क्यों ?"
ब्रोदर जॉय के चेहरे पर हवाइयां थी.. फिर वो थोडा संभले और बोले-- "चाय के समय बात करेंगे..."
प्रेयर ख़त्म हुई . तो बाहर आकर लोग चाय पीने लगे.. मायो ने मेरे हाथ में चाय का कप पकड़ा दिया ...ब्रोदर जॉय मेरे पास आये और बोले- सुदीप बिस्किट लो"
मैंने फिर उत्सुकतावश पूछा - वो... महिलाएं...."
वो बोले-"सुदीप तुम्हे ऐसे सवाल सबके सामने नहीं पूछने चाहिए.. तुमने देखा ना मेरे चर्च में महिलाएं हैं ना."
"
फिर ये सब बाइबल में क्यों लिखा...क्या इसमें गलत लिखा?"
"
नहीं गलत नहीं लिखा... तुम जानते हो ना महिलाएं कितनी बातूनी होती है... चर्च में आएँगी तो फिर प्रेयर में परेशानी होगी..."
फिर आपने इन्हें अनुमति देकर बाइबल का उलट व्यवहार क्यों किया है?"
ब्रोदर जॉय निरुत्तर थे...
अगले वेडनेसडे मायो का मैं इंतज़ार करता रहा.. शायद मेरा डोर वो खटखाटायेगा ...वो वेडनेसडे होस्टल में रहते नहीं आया...

४.
ऐलान
उसने बड़े जोश के साथ ये ऐलान किया था कि मैं बिना दहेज़ लिए शादी करके एक मिशाल कायम करूँगा..... पिता ने काफी समझाया कि बेटा मेरा समाज में मान सम्मान है..... हम खानदानी ठाकुर हैं...... तुम्हारे दादा जी की थाकुरियत ५० गांवों में चलती थी.... अब वो नहीं रहे तो ये जिम्मा मेरे ऊपर आ गया.... हमारे यहाँ दिन भर भण्डारा चलता रहता है....... बिना दहेज़ की शादी होगी तो सारे ठाकुर समाज में हमारी थू थू होगी....लोग हमारे बारे में बाते बनायेंगे....... सुदीप ने पिता की बाते सुनी तो भी उसका निर्णय नहीं बदला...... 
सुदीप के साथ काम करने वाली सजातीय कमला ने उसे नेहा से मिलवाया ...... नेहा के परिवार  में ६ लड़कियां थी और पिता निहायत ही गरीब..... सुदीप को लगा कि मेरे लिए मिशाल कायम करने और अपने मन मुताबिक शादी करने का इससे अच्छा रिश्ता नहीं मिल सकता...... उसने नेहा के पिता को शादी के लिए हाँ कर दी.... और अपनी मंशा से उन्हें अवगत करा दिया...... नेहा के पिता ने जब सुना कि बटेऊ बिना बारात और बिना दहेज़ के शादी करना चाहते हैं तो उन्हें लगा कि बिन मांगे मन्नत पूरी हो गयी...... 
सुदीप के घर वालों ने अनमने मन से उसका विवाह कर दिया ...... सुदीप ने वैवाहिक जीवन में भी अपनी पढाई को जरी रखा और वो अधिक अच्छे ओहदे के लिए प्रयास करता रहा..... उसकी पत्नी नेहा उसे पढने को मना करती और पूर्णरूप से घर परिवार ने रच बस जाने का दबाव डालती...... साथ ही रोज़ डिस्को ,,,रेस्तरो जाने की जिद्द करती...... सुदीप के मन में जैसे एक फ़ांस सी गड गयी......अब छोटी छोटी बातों पर विवाद होने लगे......उस दिन तो हद ही हो गयी..... सुदीप की तबियत खराब थी..... और नेहा ने खाना नहीं बनाया था..... सुदीप के कहने पर जबाब मिला आपकी तो रोज़ ही तबियत ख़राब रहती है...... मैं क्या सारा दिन चूल्हे में खटने के लिए हूँ.... ढाबे से खाना माँगा लो...मेरा आज खाना बनाने का बिलकुल मन नहीं है...... विवाद बढ़ गया तो नेहा ने अपना बैग सम्भाला और मायके चली गयी.....
हफ्ते बाद भी नेहा नहीं आई...... आया तो कोर्ट का नोटिस..... सुदीप ने नोटिस पढ़ा जिसमे उसके ऊपर दहेज़ उत्पीडन के चार्जेस लगे थे.... उसे याद आने लगा कि कैसे उसकी सादगीपूर्ण शादी को मिडिया में भी कवरेज मिला था...... आँखे आसुंओ से तर बतर थी और पिता का चेहरा आंसू की बूंदों में तैर रहा था.......


रचनाकार : संदीप तोमर 
पता :
संदीप तोमर 
डी-२ / १ 
जीवन पार्क , उत्तम नगर 
नई दिल्ली-११००५९ 
दूरभाष:
8377875009

Monday, July 27, 2015

"जहाँ मैं हूँ..."
(उपन्यास)-1 
चार भाई बहन में सबसे छोटा था सुदीप....जन्म से पहले कच्चे मकान में रहता था परिवार... सुदीप के आने की सुचना मात्र के समय से नया पक्का मकान बनने लगा.. आलम देखिये कि इधर पक्का मकान बनकर तैयार हुआ और उधर शिशु का आगमन हुआ.. साढ़े पांच किलो वजन का हस्ट पुष्ट बालक...मोहल्ले में शोर मच गया कि बड़ा मोटा-ताज़ा बेटा हुआ है... नए मकान में नयी खुशियां...पिताजी को लगा कि लड़का भाग्यवान है..जिसके आने की खबर मात्र से मेरा नया मकान बन गया.. सारे परिवार का ध्यान जैसे उस एक नवजात बालक पर केन्द्रित हो गया...सुप्रिया भाई के पास आती और उसे छूकर चली जाती.. माँ को देखती तो मायुस हो जाती... उसे लगता माँ अब मेरे लिए खाना भी नहीं बनाती..ऐसा क्या हुआ माँ को.. और ये बच्चा जिसे सब मेरा छोटा भाई कह रहे हैं ये क्यों आया.. अब माँ किसी को नहलाती भी नहीं... दादी कहती है- बेटा अभी ४० दिन माँ जच्चा घर में रहेगी...सुप्रिया हर बात पर गौर करती जैसेउसे सब पारिवारिक दायित्व अभी से शिख लेने हैं सुप्रिया बमुश्किल साढ़े तीन चार साल की होगी.. ६ दिन बाद घर में त्यौहार जैसा माहौल था. 
सुप्रिया ने दादी से पूछा -"दादी आज क्या हो रहा है?'
"मेरी बच्ची आज तेरे भाई की छटी है.."
"ये छटी क्या होती है दादी.."
"जब कोई बच्चा होता है तो छ: दिन बाद जच्चा बाहर निकलती ही..उसे छटी कहते हैं.."
"आज क्या होगा ?"
"आज सब घर परिवार वालो का खाना हमारे घर में होगा..डाल चवन और रोटियां बनेगीं ..तेरी सारी दादियाँ और ताइयाँ खाना बनायेंगी..."
"दादी मैं भी खाना बनाउंगी"
"मेरी बच्ची अभी तू छोटी है. जब बड़ी हो जाएगी तो सारा काम सीख लेना..लड़कियों के भाग्य में तो सारे काम लिखें हैं..."
दादी मेरा भाई भी खाना खायेगा."
"पहली.. वो अभी ६ महीने माँ का दूध पिएगा.. फिर उसे ऊपर का कुछ खिलाना शुरू करेंगे..अभी तो तू अपने बड़े भाई सुकेश और छोटे भाई नीलू के साथ खाना खाना.."
दादी सुकेश भैया मुझे मारते हैं..मैं उनके साथ नहीं खाने वाली... और नीलू की नाक बहती रहती है.."
"चल पगली वो तेरे भाई हैं..ऐसे नहीं बोलते... एक तेरा बड़ा भाई है और दूसरा छोटा..."
"दादी मेरा भाई तो छोटू है ..मेरा छोटू.. हम उसका नाम छोटू रख दें.."
"चल पगली, छोटू कोई नाम थोड़े ना होता है.. "
"एक बात बता दादी ये तू मुझे चल पगली--चल पगली क्यों बोलती है..मैं दादा से तुझे पिटवाउंगी..."
"अच्छा तेरा दादा मुझे पीटेगा?उसे रोटी नहीं खानी "
जैसे जैसे सुदीप थोडा बड़ा होता गया.. सुप्रिया का दुलारा बनता गया.. माँ ने चालीस दिन बाद घर के काम देखने शुरू किये.. तो सुप्रिया सुदीप को गोद में लेकर बैठने लगी.. स्कूल तो अभी सुकेश के अलावा कोई जाता नहीं था..सुदीप ने अपनी उम्र से पहले ही बैठना और घुटनों के बल चलना शुरू कर दिया..नौ महीने का हुआ तो खड़ा होकर चलने लगा.. पास पड़ोस की औरतें आती तो कहती- अरे देखो सुदीप कैसे पैर उठाता है.. अमूमन बच्चे 1 साल के होते हैं तो पहला कदम रखते हैं.. जब सुप्रिया किसी को भाई के बारे में कुछ कहते सुनती.. तो कहती- "चाची मेरे भाई को नजर मत लगाओ.."
चाचियाँ उसकी बात पर हँस देती. अभी सुदीप ११ महीने का हुआ ...उसे बुखार हुआ ..सारा शरीर आग सा ताप रहा था.. माँ ने उसे डाक्टर के पास ले जाने का उपाय सोचा.. पिताजी ऑफिस गए हुए थे.. दादी ने बीच में अडंगा लगा दिया.. -"तू घर की बहु है अकेले लड़के को लेकर जाएगी.. जयें का पानी उबाल कर पिला दे.. ठीक हो जायेगा..बड़ी आई डाक्टर के पास जाने वाली.."
माँ दादी के सामने बोलती नहीं थी.. दादी ने डाक्टर के पासा नहीं जाने दिया.. शरीर का ताप बढ़ता ही जा रहा था.. माँ ठन्डे पानी की पट्टी उसके सर पर रखती.. बदलती.. शाम हुई तो पिताजी घर आये,, बेटे को हाथ लगाया बदन अभी भी ताप रहा था.. माँ को साईकिल पर बैठा शहर के डाक्टर के पास ले गए.. पैर लटके हुए थे कोई हलचल नहीं हो रही थी.. डाक्टर के चेक अप किया ... और बताया --"मास्टर साहब इसे पोलियो हुआ है.."
पिताजी अध्यापक थे तो पोलियो का नाम सुन रखा था..माँ इस नाम से अनजान थी.. पुच बैठी -"डाक्टर साहब ये पोलिय क्या होता है?"
बहन जी जिसे लोग आम बोल चाल में फालिस कहते हैं.. अब ये लड़का चल फिर नहीं पायेगा.., मैं बुखार की दावा दे देता हूँ..." यहाँ इसका अभी कोई इलाज नहीं.. हाँ जिले में एक डाक्टर सलूजा हैं वो कुछ कर दें तो आपका भाग्य.. ये बीमारी बड़ी ख़राब है ..इससे नसें मर जाती है खून का दोर बंद हो जाता है.."
माँ तो रोते ही लगी... रोते रोते बुरा हाल था.. शाम घिर आई थी.. पिताजी माँ और सुदीप को लेकर घर आये.. घर आकर दादी ने पूछा क्या हुआ? पिताजी हरीप्रसाद ने बताया -माँ तेरे पोते को फालिश मारा है.."
दादी ने सुन तो रोना शुरू.. सुप्रिया सब देख रही थी.. बोली किसी से नहीं उसे समझ नहीं आया कि उसके छोटू को क्या हुआ? बस समझ रही थी कि कुछ गलत हुआ है.. उसका छोटू रोये जा रहा था.. माँ से पूछा _माँ मेरे छोटू भाई को क्या हुआ ..ये रोता चुप क्यों नहीं होता..?"
माँ ने बेटी को गले लगा लिया..-"कुछ नहीं मेरी बच्ची ..बुखार है ठीक हो जायेगा.."
"माँ ये तो आज रोज़ की तरह पैर भी नहीं चला रहा.. माँ, भाई ठीक तो हो जायेगा ना?"
माँ ने बेटी से सुना तो उसकी रुलाई फूट गयी...सुप्रिया को समझ ही नही आया कि माँ क्यों रो रही है...
डॉ. भार्गव के सुझाव को मान पिताजी सुदीप को लेकर जिले के नामी गिरामी डॉ.सलूजा के पास गए..डॉ सलूजा के क्लिनिक में पोलियो के मरीजों की भीड़ थी... पर्ची कटवा कर माँ और पिताजी अपनी बारी का इं तज़ार करने लगे.. माँ बेहद परेशान...पिताजी चिंताकुल.. अपनी बारी आने पर सुदीप को ले डॉ के केबिन में गए.. डॉ ने चेक अप किया और बड़े अनोखे अंजाद में बोला-" भाई साहब पोलियो बेहद खतरनाक बीमारी है..और इस बच्चे को इसका असर दायें पैर में ज्यादा है.. असर बाएं पैर में भी है..इसका इलाज लम्बा चलेगा.."
डॉ साहब ये रोग कैसे होता है ? क्या ये बुखार में हवा लगने वाला रोग है?"
"नहीं ऐसा कुछ नहीं है दरअसल लोग इस रोग के लक्षण और वजह दोनों ही नहीं जानते. इसलिए गलत फहमी पाल लेते है...पोलियो एक संक्रामक रोग है जो पोलियो विषाणु से मुख्यतः छोटे बच्चों में होता है। यह बीमारी बच्चें के किसी भी अंग को जिन्दगी भर के लिये कमजोर कर देती है। "
"लेकिन ये होता कैसे है "--पिताजी अध्यापक थे तो उन्हें ये सब जानने की उत्सुकता थी...
"मल पदार्थ से पोलिया का वायरस जाता है। ज्यांदातर वायरस युक्त भोजन के सेवन करने से यह रोग होता है। यह वायरस श्वास तंत्र से भी शरीर में प्रवेश कर रोग फैलाता है।"
डॉ. साहब ये तो आप एक दम नयी बात बता रहे हैं..."
जी भाईसाहब दरससल लोगो को इस बारे में अल्प ज्ञान है इसलिए भ्रांतियां पाल लेते हैं.."
"लेकिन डॉ साहब ये नसों को मारता है और हड्डिय भी कमजोर करता है.."
"नहीं,, पोलियो मॉंसपेशियों व हड्डी की बीमारी नहीं है बल्कि स्पायइनल कॉर्ड व मैडुला की बीमारी है। स्पाइनल कॉर्ड मनुष्य का वह हिस्सा है जो रीड की हड्डी में होता है।"
इसका मतलब तो ये हुआ कि स्पाइनल कॉर्ड की बीमारी होने के कारण मरीज ठीक नहीं हो सकता..."
"ऐसा भी नहीं है.. वैसे तो लोगो का मानना है कि ये रोग लाईलाज है लेकिन मैं एक डॉ. हूँ मेरा फर्ज है कोशिश करना.."
"लेकिन क्या आप इसके इलाज की गारंटी लेंगे.."
"देखिये...डॉ. कोई भगवान् नहीं होता... उसका फर्ज होता है कोशिश करना"
"अच्छा डॉ. साहब ये लकवा जैसा तो नहीं है?"
"लोगो में ये भी भ्रान्ति है कि ये लकवा है ... पोलियो वासरस ग्रसित बच्चों में से एक प्रतिशत से भी कम बच्चों में लकवा होता है।"
"पोलियों जायदातर बच्चो को ही क्यों होता है?"
"ऐसा इसलिए होता है क्योंकि बच्चों में पोलियों विषाणु के विरूद्व किसी प्रकार की प्रतिरोधक क्षमता नहीं होती है इसी कारण इसका वायरस बच्चों को अपनी गिरफ्त में ले लेता है.."
"डॉ साहब आप मेरे बच्चे को ठीक कर दीजिये..."
"कोशिश करना मेरा फर्ज है...आप बाहर काउंटर पर फीस जमा करा दीजिये.. मैंने दवाई लिख दी है..मेरा कम्पौंडर दवाई बना देगा, "
“जी डॉ साहब."-.कहकर पिताजी बाहर आये.. .कम्पौंडर ने दवाई का पुडा हाथ में थमा दिया और १०० रूपये फीस मांगी.. पिताजी की तन्खवाह बमुश्किल १५० रूपये माहवार.. और डॉ की एक विजिट की फीस १०० रूपये.. सुनकर पिताजी कुछ चौंकें. पूछा-"ये फीस पूरे महीने की है?"
"नही भाई साहब, ये एक बार की फीस है... अभी पंद्रह दिन की दवाई दी है अगली विजिट पर डॉ साहब देखेंगे कि दवा असर कर रही है या नहीं.. असर करेगी तो ये ही दवा दी जाएगी नहीं तो फिर दवा बदल देंगे.." 
..फीस जमा करके पिताजी बाहर आये... बस पकड़ कर घर वापिस पहुंचे.. दिमाग घूमता रहा... १०० रूपये फीस ...और महीने में कमाई १५० रूपये.. और तीन बच्चे .... साथ में माँ और पिताजी भी.....बड़े भाइयों का कोई सहारा नहीं.. कैसे होगा ..कहाँ से पैसा आएगा.. कैसे इलाज होगा...लगातार दो साल तक डॉ. सलूजा का इलाज चलता रहा लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ..पिताजी ने अपना और बच्चो का पेट काटकर इलाज में पैसा लगाया लेकिन नतीजा कुछ नहीं निकला तो कहीं और इलाज कराने का सोचा..
किसी ने बताया कि दिल्ली के नारायण विहार में एक डाक्टर हैं जो पोलियों का इलाज करते हैं.. माँ पिताजी दोनों सुदीप को लेकर नारायण विहार आ गए.. डाक्टर से बात हुई फिर वही जबाब मिला... डॉक्टर भगवान नहीं होता ... कोशिश ही कर सकता है.. आपको बच्चे को लेकर हफ्ते में दो बार आना होगा.. 
"आप इलाज कैसे करते हो?"-- पिताजी ने जिज्ञासा प्रकट की..
"हम बिजली की मशीनों से शरीर में झटके देकर खून का दौर पुनः चालू करने की तकनीक से इलाज करते हैं इससे नसों में जमा खून फिर से शरीर में प्रवाहित होना शुरू हो जाता है"--डॉ मुद्गल ने बताया...
पिताजी को अजीब लगा लेकिन क्या कर सकते थे.. औलाद का दुःख ही माँ-बाप के लिए सबसे बड़ा दुःख होता है.. एक आश की किरण की तलाश में मास्टर हरी प्रसाद जगह जगह की खाक छान रहे थे..बस बेटे को कहीं से आराम लग जाए...ये ही उम्मीद लेकर उन्होंने इलाज करने का फैसला कर लिया..
अब समस्या थी कि प्राइवेट स्कूल की नौकरी से छुट्टी लेकर कैसे इलाज कराया जाये.. बड़े ही मुस्किल हालात थे.. माँ मालती देवी ने ये जिम्मा लेने की ठानी..लेकिन चार-चार बच्चो का पालन पोषण करना जिनमे से तीन अब स्कूल जाने लगे थे.. और फिर १३० किलोमीटर दूर आना-जाना एक ही दिन में करना.. बड़ा ही दूभर काम था..सास ससुर का खाना बनाना.पशुओं का चारे का प्रबंध करना.. कैसे होता होगा ये सब... दादी को लगा कि बहु अपने बेटे के चक्कर में मुझ पर काम का बोझ न बढ़ा दें इसलिए उसने अपने बड़े बेटे के पास जाने का फैसला कर लिया.. मालती देवी बेटे को लेकर आई तो सास ने फरमान सुना दिया अपने बच्चो का खुद इंतजाम करना.. मैं किसी की कोई आया या नाइन नहीं हूँ.. जो इन टाब्बरों को सारे दिन हांकती रहूँ..उस दिन सास बहु में झगडा हुआ.. मालती देवी को लगता कि सास डाक्टर के पास जाने देती, समय पर बुखार का इलाज हो जाता तो आज मेरे सुदीप को ये सब न होता.. 
रात को हरिप्रसाद ने पत्नी को समझाया कि इस रोग में बुखार बाद में होता है ये बुखार से होने वाला रोग नहीं है.. तुम क्यों माँ से लड़ रही हो.. और अगर उसे भाई के पास ही रहना है तो रहने दो.. हमें अपने बच्चो की परवरिश खुद करनी हैं..
अगले दिन दादी बड़े बेटे के यहाँ चली गयी..लेकिन दादा ने अपने छोटे बेटे के साथ रहने का फैसला किया..
दादा अपने भाइयों में सबसे बड़े थे..उनसे छोटे ६ भाई और तीन बहने थी.. एक बड़े भाई की म्रत्यु जवानी में ही हो गयी थी..उनकी दो बेटियां ही थी..खुद की पांच संतान ... तीन बेटे और २ बेटियां.. दादा ने ७ बच्चों की परवरिश की ... ४ बेटियों की शादी भी की.. दो बेटे बड़े थे और हरी प्रसाद सबसे छोटे.. परिवार को गॉव गमांड में परिवार को उसके नाम से जाना जाता.. इलाके का प्रतिष्ठित परिवार.. दादा बेहद ही सीधे इंसान.. इनके सीधे होने के चलते बड़े बेटे ने घर की सब सम्पति पर अपना कब्ज़ा किया हुआ था.. मझले बेटे ने सुगर मिल में कामदार की जॉब पकड़ ली.. और खेती बड़ी का काम छोटे बेटे के जिम्मे आ गया.. उनकी पढाई लिखाई पर किसी ने ध्यान नहीं दिया.. सब अपने अपने चक्कर में लगे रहते.. हरी प्रसाद जब तीसरी क्लास में पढ़ते थे तब से ही खेती में लगा दिया गया ...किसी तरह पढ़ते रहे.. दसवी क्लास में थे तो शादी हो गयी.. फिर यहाँ वहां नौकरी करते हुए घर का गुजरा करने लगे,, १२ वी की तो भविष्य की चिंता होने लगी.. अब बड़े दोनों भाई फसल बटवाने लगे तो मालती देवी खेती में पूरा हाथ बटाती.. प्रिगनेंट रहती तो भी खेती का काम देखती..
मालती देवी का सहयोग न होता तो हरी प्रसाद पढ़ भी पाते... नीलू के जन्म के समय तक वे टीचर ट्रेनिंग कर चुके थे..सुदीप के जन्म से कुछ दिन पहले ही अध्यापक बने थे..मकान भी बिना किसी के सहयोग के बनाया था..
माँ के बड़े भाई के यहाँ जाने के फैसले से हरी प्रसाद आहत जरुर हुए थे.. लेकिन हिम्मत नहीं हारी थी..
मालती देवी बेटे को लेकर डाक्टर के पास जाती.. हरी प्रसाद स्कूल से आते तो बच्चे भी आ चुके होते.. वो स्टोव पर खाना बनाते.. सुप्रिया पिताजी को रोटी बनाते देखती तो अन्दर तक दुखी हो जाती.. उसने कहा-"पिताजी मैं रोटी बनाउंगी.. "
हाँ बेटी तू बड़ी हो जा,, फिर तुझे ही तो ये सब करना है.."-पिताजी आहत मन से कहते...
एक बच्ची बिना उम्र के बड़ी हो रही थी.. तीसरी क्लास में आई तो नन्ही अँगुलियों से तवे पर रोटियां सकने लगी..कच्ची पक्की रोटियां बनाती.. पिताजी बड़े चाव से खाते .. बच्ची का हौसला बढता.. छोटी होते हुए भी सुप्रिया पर काम की जिम्मेवारी बढ़ने लगी.. साफ सफाई.. खाना.. बर्तन सब करती.. माँ के आने से पहले तक एक भी काम न छोडती.. माँ को भी फक्र होता कि मेरे बच्चे कितने नेक हैं.. सुकेश जरुर सुप्रिया को तंग करता लेकिन फिर भी सब भाई बहनों में बड़ा प्यार .. पिता के अध्यापक होने का दबाव उनके मन पर था.. कोई भी गलत काम करने से पहले मन में आ जाए कि एक टीचर के बच्चे हैं लोग क्या कहेंगे.. ऐसे ही माहौल में परवरिश हो रही थी..
. सुदीप भी अब ५ साल का हो गया लेकिन पेट के बल ही सरकता... हाँ बस इतना सुधार आया कि अब घुटनों के सहारे घिसड़कर जमीन पर चल लेता.. मोहल्ले के कुछ बच्चे उसके दोस्त बन गए.. महेश और राजेंद्र उसके हमउम्र थे.. तो पहले उनसे ही दोस्ती हुई..छोटे मोटे खेल खेलते.. सुदीप का दिमाग तीव्र गति से चलता ये बात हरी प्रसाद को समझ आने लगी थी.. उनका मन कहता कि बच्चा थोडा भी खड़ा होने लगे तो इसे स्कूल भेजा जाये..
सुप्रिया भाई का ख्याल रखती..जिस दिन उसकी छुट्टी होती और माँ को डाक्टर के पास नहीं जाना होता तो सुप्रिया ही भाई को नहलाती उसके कपडे बदलती..
कोई भी इलाज सुदीप पर कारगर नहीं हो रहा था.. माँ पिताजी सब परेशान..किसी ने बताया कि बुढाना कस्बे में बस स्टैंड के पास एक देशी वैद है .. जो इसी तरह के मरीजों का इलाज करता है.. सुदीप को इलाज के लिए वहां ले जाने का फैसला किया गया...
एक सुबह मास्टर हरी प्रसाद और मालती देवी सुकेश को लेकर बुढाना डॉ सुबोध के क्लिनिक पहुंचे.. सुदीप अब बातों को समझने लगा था.. वो सब बातों का बारीकी से निरीक्षण करता.. कहते हैं कि जब किसी का अंग भंग होता है तो उनकी संवेदना का स्तर बढ़ जाता है और उसकी उस अंग विशेष की ताक़त भी मस्तिष्क में चली जाती है..चुनांचे सुदीप का मस्तिष्क भी शीघ्रता से परिपक्व हो रहा था..हरी प्रसाद ने सुदीप को गोद से उतार एक बैंच पर बैठा दिया...डॉ सुबोध ने बताया कि ये लड़का तीन साल में सड़क पर दौड़ेगा... और आप यही इसी बेंच पर बैठे हुए देखोगे..उन्होंने कुछ मरीजों से बात करायी.. उनके माँ-बाप से बात करायी.. जिन्होंने बताया कि हमारा बच्चा भी पेट के बल सरकता था..इसे आज डॉ साहब ने इतना कर दिया कि अब धीरे-धीरे चलने लगा है.. सुदीप ये सब बाते सुन रहा था तो उसने कल्पना की कि एक दिन मैं भी और सब की तरह चल पाउँगा..
इलाज शुरू हो गया था.. हर तीसरे दिन डाक्टर बुलाता कुछ अजीब से तेल की मालिश करता और फिर पट्टियों को लपेट देता... पट्टियों के नीचे लकड़ी की खरपच्चिया होती जो सुदीप को चुभती और उसे परेशान करती.. उसका मन बाहर दोस्तों के साथ खेलने का करता..अब वो दीवार पकड़ कर थोडा चलने का प्रयास करता.. डॉ ने बताया कि इसे एक गडुलना लाकर दो ये उसे पकडकर चलेगा.. पिताजी बढई से एक गडुलना बनवाकर ले आये.. सुदीप अब गडुलने की सहायता से चलने का प्रयास करता... हर पंद्रह दिन बाद डॉ सुबोध दोनों पैरों पर प्लास्टर कर देता.. और फिर दो तीन दिन उसका चलना फिरना बंद हो जाता..इस इलाज से एक फायदा ये हो रहा था कि अब वो घर से बाहर कुछ कदम रखता ...उसे अनुभव होता कि दुनिया इस चारदीवारी से भी आगे है... माँ ने पिताजी को कहकर एक हिंदी का कायदा मंगवा दिया और एक स्लेट... अब सुदीप का स्कूल घर पर ही लगने लगा.. मध्यमा पास माँ उसे क ख ग पढ़ाती... स्लेट पर लिखाती... उसका कई बार मन नहीं होता तो माँ सख्ती दिखाती.... उसका पढाई में मन नहीं लगता... माँ घर के काम काज करती तो साथ में पीढ़े पर सुदीप को बैठा लेती.. और उससे पढने को कहती.. प्लास्टर और पट्टियों के बीच जूझता बालक कैसे पढाई में मन लगाये.. क्लास में तो मास्टर का ध्यान ज्यादा बच्चो पर रहता है लेकिन यहाँ तो एक अध्यापक और एक ही छात्र.. वो निगाह भी बचाए तो कैसे... माँ सख्ती करने लगी... हिंदी के कायदे का काला पन्ना जो कीस के भी होश उड़ा दे... माँ चाहती कि उसे वो काला पन्ना कंठस्थ हो... सुदीप को काले पन्ने के लिए मार भी लगती...तब सुदीप को स्कूल गयी बहन सुप्रिया की याद आती.. दीदी घर पर होती तो उसे पिटाई से बचा लेती.. वो दीदी के स्कूल से आने की प्रतिक्षा करता... सुप्रिया स्कूल से आती तो ही वो खाना खाता..
उम्र बढ़ने से शरीर का वजन भी बढ़ रहा था.. माँ डॉक्टर के पास जाती तो रिक्शा न लेकर पैदल ही जाती.. सात साल की उम्र के बच्चे को गोद में लेकर चलाना ऊपर से पट्टी और प्लास्टर का भी वजन.. माँ मुश्किलों से उसे ढाई-तीन किलोमीटर दूर बस अड्डे तक ले जाती और वहां से बस से बुढाना जाती... अब ये सब जिन्दगी का एक हिस्सा बन गया था..
वीरेंदर चाचा स्कूल में पढ़ते थे.. यशवीर चाचा फ़ौज में थे.. लेह में पोस्टिंग हुई ..वो फ़ौज से छुट्टी आये तो बादाम और अखरोट लाये.. सुदीप बहुत खुश हुआ.. उसने बादाम खाए, अखरोट उसे पसंद नहीं आये...चाचा जितने दिन छुट्टी आते तो रोज़ सुदीप से मिलने आते.. वो बहुत खुश होता.. चाचाजी सबको प्यार करते लेकिन सुदीप को कुछ ज्यादा..
चाचाजी की शादी हुई लेकिन सुदीप को पट्टियाँ बंधी होने के कारण कोई उसे बारात में नहीं ले गया..वो उस दिन बेहद दुखी हुआ..रोता रहा.. उसे यशवीर चाचा से बहुत लगाव था.. वो भी बारात में जाना चाहता था..उसने उस शाम खाना भी नहीं खाया..वो सोचता रहा कि मैं यूँ इस हाल में ना होता तो मैं भी सुकेश भैया और नीलू की तरह नए कपडे पहनता बारात का खाना खाता..रोत्ते रोते कब नींद आई होगी पता ही नहीं चला.
एक दिन माँ डाक्टर के पास से सुदीप को लेकर आ रही थी.. रास्ते में वीरेंदर चाचा मिले.. बोले- “भाभी सुदीप को मेरी साईकिल पर बैठा दो.मैं घर ही जा रहा हूँ.” ..माँ ने उसे साईकिल पर बैठा दिया.. चाचा उसे लेकर चल दिए, अभी गॉव में घुसे ही थे कि देखा कुछ बच्चे शोर मचा रहे थे.. साईकिल रोक वो उन्हें देखने लगे.. बच्चे एक टिड्डे को पकड़ने के लिए शोर मचा रहे थे.. चाचा भी उस मण्डली में शामिल हो गए...टिड्डा सुदीप की कमर पर आकर बैठा .. उसने जैसे ही उससे डरकर कमर को हिलाया.. साईकिल ने अपना बैलेंस खोया और साईकिल और सुदीप दोनों धडाम नीचे... बाए हाथ की कोहनी की हड्डी टूट गयी.. चाचा घबराकर भाग गए,.. सुदीप रोये जा रहा था.. माँ आई तो बहुत तमाशा हुआ.. चाचा जाकर खेत में छुप गए थे...अब खचेडू चुढ़े को बुलाया गया.. उसने सोचा कि कोहनी उतरी है हिलाडुला कर कुछ किया और लुडपुड़ी बनवाकर बांध दी..दर्द के मारे वो कराहता रहा..अलगे दिन सुबह होते ही पिताजी सुरेश डाक्टर के यहाँ ले गए..हाथ पर भी प्लास्टर बांध दिया... 
सुदीप हाथ और पैर दोनों पर प्लास्टर देख रोता रहता..
माँ चाहती कि वो पढ़े.. अब हिंदी के साथ साथ गिनती का भी जोर होने लगा.. गिनती उसे फट से याद हो जाती.. २० तक के पहाड़े भी रट गए.. छोटे मोटे गुना भाग जोड़ घटा भी सीख गया. इन सबमें सुप्रिया का उसे भरपूर साथ मिलता..हाथ का प्लास्टर कट गया था..लेकिन अब कोहनी का मुड़ना बंद .. रोज़ गर्म पानी की सिकाई.. कभी कभी सुप्रिया भी झल्ला जाती कि सारा काम मेरे जिम्मे दिन में चार चार बार सिकाई... छोटी बच्ची ऊपर से काम का इतना बोझ.. लेकिन फिर सोचती मेरा भाई है जल्दी ठीक हो जायेगा.. ...
डॉ.सुबोध प्लास्टर के बाद पंद्रह दिन पैर खुले छोड़ देता ताकि जोड़ जाम न हो जाये.. पंद्रह दिन फिर पैरों की सिकाई होती और पैर को खोलने के लिए व्यायाम करना पड़ता.. सुदीप एक भी कम रोज़ रोज़ करने से उकता जाता.. लेकिन माँ कि सख्त हिदायत थी कि ठीक होना है दूसरे बच्चों की तरह चलना है तो ये सब करो.. 
माँ खेत का काम करती पशुओं का काम करती.सुदीप घर पर अकेला बोर हो जाता... बसंती दादी..उसे अपने दालान में बुला लेती.. बसंती दादी और हरी प्रसाद का एक ही दालान था बस बीच में एक दरवाजा लगा था.. जो सिर्फ रात में ही बंद होता.. दोनों परिवारों का एक ही नल था जिस पर दोनों परिवारों का काम होता था.. नहाना धोना,... बर्तन सब.. बिजली भी सिर्फ मास्टर हरी प्रसाद के यहाँ ही थी.. रात में दोनों परिवारों के बच्चे वहीँ पढ़ते थे..
इस बीच दादी की तबियत ख़राब चल रही थी.. माँ पिताजी ताउजी के यहाँ जाते.. उनकी सेवा करते.. ताई माँ मालती देवी के सामने दिखाती जैसे खूब सेवा करती है लेकिन वैसे कुछ नहीं करती.. माँ के दादी के पास जाते ही वहीं आ जाती ताकि सास-बहु मेरी बातें न करने लगे.. माँ दादी के बाल धोती.. कंधी करती उसके कपडे बदलती..कभी सुकेश भैया दादी से मिलने जाते तो दादी उसे ताऊ के बच्चो के कंचे दे देती और कहती मेरे छोटे पोते को दे देना..
एक दिन खबर आई कि दादी मर गयी.. उस दिन सब लोग ताऊजी के यहाँ गए.. सुदीप को खाना बसंती दादी ने खिलाया.. सुदीप को दादी के अंतिम दर्शन भी नहीं हुए.
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अभी हाथ का प्लास्टर खुला नहीं था......माँ डॉ. सुबोध से सुदीप का इलाज करवाकर आ रही थी... पैसे बचाने के चलते उसने रिक्शा नहीं किया.. वो उसे गोद में ले वापिस आ रही थी.. रास्ते में फाटक पड़ते थे.. ट्रेन आने का समय था.. फाटक बंद... ऐसी स्थिति में अक्सर लोग फाटक के नीचे से निकलकर आते जाते.. माँ ने समय बचने के लिए फाटक के नीचे से निकलने का प्रयास किया.. एक फाटक पार करके दूसरा फाटक पार ही किया था कि पैर एक पत्थर से टकराया... माँ का संतुलन बिगड़ा तो उसने अपनी कोहनी नीचे टिका दी ताकि सुदीप के हाथ का प्लास्टर नीचे न लगे.. माँ जैसे-तैसे संभली दो कदम ही चली थी कि पैर के नीचे केले के छिलके के आ जाने से माँ का संतुलन फिर बिगड़ गया.. माँ ने फिर से कोहनी नीचे टिका दी..माँ की कोहनी लहुलुहान हो गयी..सुदीप की आँखों में आंसू थे.. वो किसी से कुछ कहने कि स्थिति में नहीं था लेकिन वो इन सब बातों से सीख रहा था और उसका मानसिक विकास और सामजिक विकास इन घटनाओं पर निर्भर था... 
माँ के हाथों की चोट उसे परेशां कर रही थी.. 
दो दिन बाद फिर डाक्टर की विजिट थी....माँ जा नहीं सकती थी..पिताजी ने जाने का फैसला किया.. स्कूल से छुट्टी ली और बुढाना डॉ. सुबोध के पास चले गए..डॉ ने हाथ और पैर का प्लास्टर काट दिया और पैरों पर पट्टियाँ बांध दी.. पिताजी वहां से चलने के लिए बस स्टैंड पर आ गए.. अभी बस नहीं आई थी.. स्टैंड के पास एक बुजुर्ग और एक लड़की बैठे थे... पिताजी ने सुदीप को उनके पास बैठा दिया.. बुजुर्ग और पिताजी आपस में बाते करने लगे..बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ तो घर परिवार की बातें होने लगी..परिचय हुआ.. इस बीच बस आ गयी.. बस लगभग भरी हुई थी.. पिताजी और बुजुर्ग दो वाली एक सीट पर बैठ गए.. सुदीप को उस लड़की की गोद में बैठा दिया...उसका नाम सुधा था.. एकदम सीधी सादी लड़की.. सुधा ने सुदीप के पैरों पर पट्टियाँ लिपटी देखी और गले में पट्टी डालकर हाथ उसने डाले हुए.. वो थोड़ी मायूस सी हुई.. उसने पूछा-"तेरे पैर में ये पट्टी क्यों बंधी हैं."
सुदीप चुप बैठा रहा... सुधा ने फिर उत्सुकता दिखाई...पैर को हाथ लगाकर कहा-"दुखता है"
सुदीप ने रूखेपन में जबाब दिया-"नहीं"
आगे उनमे कोई बातचीत नहीं हुई.. पिताजी और बुजुर्ब बात करते रहे..शहर आने पर वो लोग उतरे.. पिताजी ने बस से उतरकर सुदीप को पास की दुकान पर खड़ी साईकिल पर बिठाया और गॉव आ गए..
शाम को पिताजी ने माँ को बताया-"आज बस में एक बुजुर्ग मिले उनकी पोती उनके साथ थी.. उनका रिश्ता बड़े भाई के मझले बेटे अखिल से तय हुआ था.. लेकिन भैया भाभी ने रिश्ता तोड़ दिया..बुजुर्ग ने अपनी पोती से मेरे पैर छुवाए.. मैंने उन्हें रिश्ते की हामी भर दी..कल भाई से बात करता हूँ..."
अगले दिन पिताजी ताउजी के पास गए और रिश्ते के बारे में पूछा, ताउजी ने कहा –“हरीप्रसाद तेरी भाभी मना कर रही है..
पिताजी ने कहा- "भाई मैंने जुबान दी है अब शादी तो वही से होगी..."
बड़े भाई ने छोटे भाई की जुबान का सम्मान करते हुए रिश्ता पक्का कर लिया... और अखिल की शादी सुधा से हो गयी..सुधा का परिवार गरीब था ... वो बारात का स्वागत बहुत अच्छे से नहीं कर पाए तो परिवार हरी प्रसाद से नाराज हुआ..
सुधा ताई की दूसरे नंबर की बहु थी..गरीब परिवार की लड़की ....कम दहेज़ ला पाई..उम्र भी कम ...बहु सास को पसंद नहीं आई.. अखिल का भी व्यवहार रुखा था.. एक लड़की अनजान घर में अपना घरबार सब छोड़कर जाती है.. एक पति अगर सही से व्यवहार करे तो उसके सब गिले शिकवे ख़त्म हो जाते हैं.. सुधा खुद को प्रताड़ित महसूस करती...लेकिन उसके अन्दर विरोध का स्वर ना था..लिहाजा रिश्ता टूटने के कगार पर आ गया.. सुधा का भाई आया.. परिवार ने बहु को रखने में अपनी असमर्थता जताई...हरी प्रसाद को बुलाने के लिए छोटे बेटे प्रदीप को गॉव भेजा गया... मालती देवी सुदीप को डाक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार कर रही थी..उन्होंने प्रदीप को कहा---“तुम सुदीप को लेकर जाओ तेरे चाचा और मैं आते हैं”..सुदीप को प्रदीप की सायकिल पर बैठा दिया गया..अभी शहर से ३०० मीटर कि दूरी बची होगी कि सुदीप का पैर सायकिल के पहिये में आ गया..वाल्वबॉडी पैर में घुसी तो सायकिल चलना मुस्किल..सुदीप रोने लगा.. प्रदीप ने सायकिल रोकी.. लहुलुहान पैर देखा तो वो घबरा गया.. जैसे जैसे डॉ. सुरेश के क्लिनिक पहुंचे.. डॉ. सुरेश ने पट्टी बंधी लेकिन खून नहीं रुका.. तब तक हरी प्रकाश और मालती देवी भी आ चुके थे.. अब सुदीप को शिवमूर्ति के पास डॉ. राजेंद्र के पास ले जाया गया..वहां उसके पैर में ४ टांके लगे.. सुदीप को लेकर मालती देव घर आ गयी.. हरी प्रसाद अपने भाई के घर पहुंचे.. अखिल को समझाने के प्रयास होने लगे.. अखिल टस से मस होने को तैयार नहीं हुआ.. हरिप्रसाद असमंजस में पड़ गए..जब उन्हें कुछ रास्ता न सुझा तो उन्होंने कहा- “जब तक कुछ तय नहीं हो जाता सुधा गॉव में रहेगी.”. बहुत हा-हुल्ला के बाद सुधा गॉव आ गयी.. 
सुदीप की संवेदना इस तरह की घटनाओ से प्रभावित हो रही थी..बिना स्कूल जाये उसकी सामाजिक पाठशाला शुरू हो गयी थी..ये पहला अवसर था जब उसके दिल में स्त्री संवेदना का जन्म हुआ.. उसका हृदय रोने लगा.. वो माँ का समर्पण देख रहा था, वो बहन सुप्रिया का स्नेह देख रहा था ...उसने स्त्री को दादी के रूप में देखा था.. सब अपने थे.. स्त्री से एक नया रिश्ता देखा ..भाभी का रिश्ता ..उसे माँ ने बताया... भाभी भी माँ होती है भाभी माँ..सुधा से ये उसकी दूसरी मुलाकात थी.. उस दिन खाना सुधा ने ही बनाया...
सुदीप ने गुरु के रूप मे माँ को देखा.. माँ उसे पढ़ाती थी..उसे दुनियादारी सिखाती थी..वो माँ के प्रति और भाभी माँ का प्रति श्रद्धामय था.. 
अगले दिन माँ खेत में चली गयी.. भाभी माँ ने घर का काम किया..फुर्सत मिली तो सुदीप से बोली- " सुदीप खाना खाओगे..?"
"हाँ भाभी, बहुत भूख लगी है.."-ये सुदीप का सुधा से भाभी बनने के बाद पहला संवाद था.."
सुधा खाना लगा लायी..सुदीप खाना खाने लगा.सुधा बोली-"सुदीप तुम इतना कम क्यों बोलते हो?"
"भाभी क्या बोलू ... मैंने कुछ देखा ही नहीं.. घर से बाहर जाता ही नहीं... तो कुछ सीखा ही नहीं..माँ कहती है कि जब बात को जानो तब ही बोलो..वर्ना नहीं बोलो..."
"देवर जी तुम बहुत अच्छे हो..."
"पता नहीं ,, मुझे तो सुप्रिया दीदी ही अच्छी लगती है..."
"क्यों भाभी अच्छी नहीं है..?"
"भाभी तो माँ होती है ?"
"ये तुमसे किसने कहा?"
"माँ कहती है "
"अच्छा ,चाची ऐसा बोली थी"
हाँ भाभी, माँ ही मुझे पढ़ाती है वो ही सिखाती है सब कुछ..."
सुदीप सबसे ज्यादा बातें सुप्रिया दीदी से ही करता था.. उसने पहली बार किसी और से इतनी बात की...
“देवर जी आप बहुत सीधे- बहुत भोले हो” –सुधा भाभी ने कहा था..
“पता नहीं भाभी. मैं घर में ही रहता हूँ न..कहीं जाता नहीं ना ..मुझे पता नहीं कैसे बात करते हैं.भाभी मैंने कुछ गलत तो नहीं बोला. ?”
“नहीं देवर जी..आप ने कुछ भी तो गलत नहीं बोला.”
“कुछ गलत बोलूं तो मुझे आप ही डाट देना.. माँ को मत बताना..वर्ना तो डाट पड़ेगी.. माँ बूलेगी-तूने भाभी तो तंग किया.”. 
“अरे, आप ऐसे क्यों बोल रहे हो..मैं चाची को तब बोलूंगी न जब आप मुझे तंग करोगे.”
“मुझे माँ की डाट से बहुत डर लगता है..जानती हो माँ को लगता है घर में मैं ही सबसे ज्यादा शरारती हूँ..नीलू को तो माँ सीधा समझती है.और नीलू तो सब शरारत करता है और फिर माँ के सामने सीधा बन जाता है. हम सबको उसकी वजह से डाट पड़ती है.”
“अच्छा नीलू इतने शरारती हैं. लगते तो बहुत सीधे हैं”.
“भाभी,सब ऐसे ही सोचते हैं..लेकिन वो ही मुझे डाट पड़वाता है..प्रिया दीदी ऐसा नहीं करती.दीदी मुझे बहुत प्यार करती है”.
“ये तो अच्छी बात है.. प्रिया आपको प्यार करती है..करें क्यों न.. आप हो ही इतने प्यारे..”
भाभी ने आगे कहा-“ देवर जी आप बड़ा होकर क्या बनना चाहते हो ?”
“चलूँगा तो बनूँगा ना “-कहकर सुदीप की आँखों में आंसू आ गए.
“दिल छोटा न करो.. आप ठीक हो जाओगे..मेरा मन कहता है”
“पता नहीं .. माँ भी कहती है कि मैं अपने बेटे के लिए इतनी हितया भर रही हूँ ..एक दिन उसे अपने पैरों पर चलते देखना चाहती हूँ..”
“एक दिन चाची के मन की जरुर पूरी होगी..”
उस दिन सुदीप की आँखों में आंसू थे..सुधा ने उन आंसुओं को पोंछने के लिए हाथ बढाया लेकिन कुछ सोचकर हाथ रोक दिए,, 
क्रमशः